
रतलाम। शहर के चर्चित प्रॉपर्टी व्यवसायी राजकुमार सुराना, जिन्हें लोग राजू सुराना के नाम से भी जानते हैं, उन्हें चेक बाउंस के एक पुराने मामले में न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अनुपम तिवारी की कोर्ट ने न केवल उन्हें जेल की सजा सुनाई, बल्कि साढ़े दस लाख रुपये के करीब का हर्जाना भरने का भी आदेश दिया है।”
चेक अनादरण (Check Bounce) के मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए रतलाम के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अनुपम तिवारी की कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार देते हुए 6 माह के साधारण कारावास और चेक राशि से कहीं अधिक प्रतिकर (Compensation) देने का आदेश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
मामला रतलाम के ज्ञानमल पिता राजमल सिंगावत (परिवादी) और राजकुमार पिता पूनमचंद सुराना (अभियुक्त) के बीच का है। परिवादी ज्ञानमल, जो समाज सेवा से जुड़े हैं, उन्होंने न्यायालय को बताया कि राजकुमार उनके यहाँ कार्य करते थे। बकाया धनराशि के भुगतान के रूप में राजकुमार ने उन्हें 7,00,000 रुपये (सात लाख) का एक चेक (बैंक ऑफ बड़ौदा, चांदनी चौक शाखा) दिया था।
जब इस चेक को बैंक में लगाया गया, तो ‘खाते में पर्याप्त राशि नहीं’ (Funds Insufficient) होने के कारण चेक बाउंस हो गया। इसके बाद कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद आरोपी ने भुगतान नहीं किया, जिससे तंग आकर परिवादी ने न्यायालय की शरण ली।
न्यायालय का सख्त फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद, माननीय न्यायालय ने आरोपी राजकुमार सुराना को धारा 138 परकाम्य लिखत अधिनियम (NI Act) के तहत दोषी पाया। कोर्ट ने निम्नलिखित दंड अधिरोपित किए:
सजा: 06 माह का साधारण कारावास।
प्रतिकर (हर्जाना): आरोपी को परिवादी को 10,46,500 रुपये (दस लाख छियालीस हजार पांच सौ रुपये) देने का आदेश। यह राशि मूल चेक राशि पर 9% वार्षिक ब्याज और अनुमानित खर्चों को जोड़कर तय की गई है।
अतिरिक्त सजा: यदि आरोपी प्रतिकर की राशि जमा करने में विफल रहता है, तो उसे 15 दिन का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
बचाव पक्ष की दलीलें हुईं खारिज
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि चेक चोरी का है या पुराना है, लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को ‘पश्चावर्ती सोच’ और आधारहीन माना। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चेक पर हस्ताक्षर होने के बाद उसकी जिम्मेदारी जारी करने वाले की होती है।
इस मामले में परिवादी की ओर से पैरवी अधिवक्ता श्री आलोक शुक्ला ने की।
