
त्योहार आते ही हमारे और अखबारों के बीच एक बहुत ही पवित्र रिश्ता कायम हो जाता है—अखबार हमें सपने बेचते हैं और हम उन्हें तह करके कबाड़ में बेचने की तैयारी करने लगते हैं।
अभी पंचांग ने ठीक से करवट भी नहीं ली होती कि अखबारों के पन्ने सुबह-सुबह ऐसे चमकने लगते हैं, मानों पूरा देश आर्थिक महाशक्ति बन गया हो और हर नागरिक के घर में कुबेर का खजाना खुला हो। पहले पन्ने पर छपता है— “दिवाली पर टूटेगा बिक्री का हर रिकॉर्ड, ग्राहकों में गज़ब का उत्साह!” यह पढ़कर कभी-कभी भ्रम होता है कि शायद मैं ही किसी दूसरे देश के मोहल्ले में रहता हूँ, जहाँ लोग पैसों के लिए नहीं, बल्कि फुर्सत में गिनने के लिए तरस रहे हैं।
भाई साहब, ज़रा अखबार के इस ‘उत्साह’ और हमारी जेब के ‘सन्नाटे’ के बीच का फासला नापिए।
सुबह-सुबह जब चाय की चुस्की के साथ अखबार खुलता है, तो लगता है कि देश का बच्चा-बच्चा इस समय सिर्फ दो ही कामों में व्यस्त है—या तो वे शॉपिंग मॉल में ट्रॉली भरकर सामान ढो रहे हैं, या फिर क्रेडिट कार्ड स्वाइप करते-करते उनके हाथ घिस गए हैं। लेकिन असली ड्रामा तो तब शुरू होता है जब आप अखबार को साइड में रखकर अपने मोहल्ले की करियाने की दुकान पर जाते हैं।
वहाँ दुकानदार महोदय उदास मुँह लेकर मक्खियाँ भगा रहे होते हैं। पूछो कि “भैया, बाजार में तो ऐतिहासिक उछाल है, मंदी कहाँ है?” तो वे ऐसा गहरी साँस लेते हैं कि दुकान का पंखा भी थोड़ी देर के लिए बंद हो जाए। वे बताते हैं कि ग्राहक आता है, सामान उलट-पलट कर देखता है, रेट पूछता है और फिर ऑनलाइन ऐप पर सस्ता देखकर चुपचाप निकल लेता है। मोहल्ले के छोटे व्यापारी की हालत उस धोबी के कुत्ते जैसी हो गई है—न घर का, न घाट का, बीच में ऑनलाइन सेल और बड़े कॉर्पोरेट्स का ऐसा चक्कर है कि साँस लेना भी भारी पड़ रहा है।
लेकिन यह दर्द अखबार में क्यों छपेगा? भई, अखबार को चलाने के लिए स्याही चाहिए, और स्याही खरीदने के लिए उन कंपनियों के विज्ञापन चाहिए जो यह साबित करने पर तुली हैं कि बिना नई कार और पांचवें स्मार्टफोन के आपका जीवन व्यर्थ है।
अब ज़रा उस आम आदमी (यानी हम और आप) की वित्तीय सेहत पर भी गौर फरमाइए। सैलरी वही, महंगाई आसमान छूते हुए ऐसे निकल गई है जैसे रॉकेट अंतरिक्ष में जाता है। लेकिन उपभोक्तावाद का यह चक्रव्यूह ऐसा है कि आपको समझाया जाता है कि यदि आपने इस त्योहारी सीजन में उधार लेकर भी कुछ नया नहीं खरीदा, तो आपका समाज में उठना-बैठना मुश्किल हो जाएगा।
नतीजा क्या है? लोग खुशी से नहीं, बल्कि EMI और ‘बाय नाउ, पे लेटर’ (Buy Now, Pay Later) के फंदे में फँसकर खरीदारी कर रहे हैं। आज की तारीख में त्योहार का मतलब भगवान की आराधना कम और बैंकों के लोन रीपेमेंट की तारीख का डर ज्यादा हो गया है। आदमी सोचता है कि इस महीने की किस्त तो चुकानी ही है, चलो एक और छोटकू सा लोन लेकर टीवी ही बदल लेते हैं।
तो कुल मिलाकर गणित यह है कि चमकती हुई हेडलाइंस और अखबारों के रंग-बिरंगे पन्ने विज्ञापनदाताओं की जेबें गर्म कर रहे हैं, और आम आदमी की जेब ठंडी पड़ी है।
इस बार त्योहारी चमक-धमक के इस कृत्रिम कोहरे को थोड़ा हटाइए। उधार की चकाचौंध से बाहर निकलिए और अपने आस-पास के उन छोटे दुकानदारों की मदद कीजिए जिनकी असली दीवाली आपके दो पैसे के सामान खरीदने से रोशन हो सकती है, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के बैंक बैलेंस से नहीं।
आखिरकार, असली त्योहार जेब के वजन से नहीं, दिल के सुकून से मनाया जाता है—और सुकून कभी क्रेडिट कार्ड के स्टेटमेंट में नहीं मिलता!




