
शहर में इन दिनों ‘विकास की गंगा’ बह रही है। इतनी तेज़ कि कुछ लोग तो डर रहे हैं कि कहीं इस बाढ़ में उनकी समस्याएं बह न जाएं। लेकिन रतलाम के ही एक वार्ड में स्थिति थोड़ी अलग है।
पिछले 20 सालों से यहाँ की सड़कें अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं। धूल और गड्ढों का ऐसा संगम है कि आदमी घर से साफ़-सुथरा निकले तो
ऑफिस पहुँचते-पहुँचते ‘पुरातत्व विभाग’ का हिस्सा लगने लगता है। हाल ही में जब एक बड़े अधिकारी यहाँ पधारे और नगर निगम के ज़िम्मेदारों को ‘लताड़’ लगाई, तो लगा कि शायद अब किस्मत बदलेगी। साहब की डांट में दम तो था, लेकिन सिस्टम की ढिठाई उससे कहीं ज़्यादा भारी निकली।
हैरानी की बात तो ये है कि जहाँ पूरा प्रशासन डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी के सपने बुन रहा है, वहाँ एक मोहल्ले को सिर्फ इसलिए कालापानी की सज़ा दी जा रही है क्योंकि उन्होंने अपनी मर्जी का बटन दबाया था। यह ‘आम आदमी का चश्मा’ यही देख रहा है साहब की डांट और नेता की ज़िद के बीच जनता फुटबॉल बनी हुई है।
वरिष्ठ अधिकारी आते रहेंगे, फटकार लगाते रहेंगे और निगम के बाबू फाइलें दबाते रहेंगे। पर साहब, याद रखिये… चुनाव फिर आएंगे। तब यही जनता होगी, यही सड़क होगी और यही ‘वोट की पर्ची’ होगी।
अभी जनता चुप है, क्योंकि वह देख रही है कि विकास की गंगा कहाँ जाकर सूख रही है। पर याद रखिये, ‘पब्लिक’ है… सब जानती है!
