आम आदमी का चश्मा: खुशियों का ‘डीजे’ या मौत का मातम?

आजकल शादियों का कार्ड बाद में छपता है, पहले फेफड़ों में कंपन पैदा करने वाला ‘डीजे’ बुक होता है। रतलाम हो या कोई और शहर, अब शादियाँ ‘दो दिलों का मिलन’ कम और ‘दो मोहल्लों की जंग’ ज्यादा नजर आती हैं। सादगी को हमने ‘गरीबी’ मान लिया है और शोर को ‘स्टेटस सिंबल’।


​साहब! ये ‘खुशी’ है या ‘आतंक’?


कलेक्टर और एसपी साहब से सीधा सवाल है—क्या ‘शोर’ मापने का पैमाना सिर्फ दफ्तर की फाइलों तक सीमित है? हर साल ध्वनि प्रदूषण के नियमों की धज्जियां उड़ती हैं, लेकिन क्या कभी किसी जिम्मेदार ने सड़क पर उतरकर इन डेसिबल्स को नापा है?


​पुलिस का रोल: क्या खाकी सिर्फ बारात को रास्ता देने के लिए है, तब पुलिस ‘मूकदर्शक’ क्यों बनी रहती है? क्या किसी की बारात निकालना किसी मरीज की जान बचाने से ज्यादा जरूरी है?


​नगर निगम की चुप्पी: क्या शहर की सड़कें अब ‘प्राइवेट डांस फ्लोर’ हैं? घंटों ट्रैफिक जाम करके ‘नागिन डांस’ करना अब अधिकार बन गया है।
​दिखावे की ‘बलि’ चढ़ती संवेदनाएं


हालिया खबरें रूह कंपा देने वाली हैं—कहीं नाचने की बात पर चाकू चल रहे हैं, तो कहीं गाली-गलौज से शादी का पंडाल श्मशान बन रहा है।
​छात्र और बुजुर्ग: परीक्षा के समय छात्र सिर पकड़कर बैठा है और बाहर प्रशासन की ‘खामोश रजामंदी’ से शोर का टॉर्चर जारी है। दिल के मरीजों के लिए यह संगीत नहीं, जानलेवा हमला है।


​कड़वा सच: > प्रशासन की सुस्ती और रसूखदारों के दबाव ने नियमों को बौना बना दिया है। जब तक ‘दिखावे की इस बीमारी’ पर कानूनी चाबुक नहीं चलेगा, तब तक शादियों के नाम पर यह ‘मौत का तांडव’ ऐसे ही चलता रहेगा।


​हमारी गुहार: वक्त है दिखावे का चश्मा उतारकर इंसानियत का आईना देखने का। प्रशासन नींद से जागे और जनता अपनी जिम्मेदारी समझे, वरना याद रखिए—अगला डीजे शायद किसी और की बर्बादी का जश्न मना रहा होगा।


​क्या आपको लगता है कि स्थानीय प्रशासन की इस ‘खामोश रजामंदी’ के पीछे सिर्फ लापरवाही है या कोई राजनैतिक दबाव?

Website Design by

KAMAKSHI WEB

Contact : 9753910111

Have any thoughts?

Share your reaction or leave a quick response — we’d love to hear what you think!