
विशेष रिपोर्ट (न्यूज़ डेस्क): कहने को तो कृषि उपज मंडी अन्नदाताओं और व्यापारियों का केंद्र है, लेकिन आज यहाँ की हकीकत कलेजा कंपाने वाली है। करोड़ों का मंडी टैक्स वसूलने वाला प्रशासन कुंभकर्णी नींद सोया है और पूरा परिसर बदहाली के आंसू बहा रहा है।
1. सरेआम ‘बाल श्रम’ का खेल, जिम्मेदार मौन
मंडी शेड के नीचे कानून और इंसानियत की सरेआम धज्जियां उड़ रही हैं। अधिकारियों की नाक के नीचे लगभग 13 वर्ष से कम उम्र की मासूम बच्चियां अनाज की भारी-भरकम बोरियां संभालने और कड़ा श्रम करने को मजबूर हैं। जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, वहां शोषण का खेल चल रहा है और बाल संरक्षण विभाग व मंडी प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है।
2. चरमराई व्यवस्था
मंडी की इसी लचर व्यवस्था के विरोध में विगत दिनों व्यापारियों ने अपना काम पूरी तरह बंद कर दिया था और प्रशासन के सामने 9 सूत्रीय मांगें रखी थीं, जो यहाँ की बदहाली पर सीधा सवाल उठाती हैं:
जाम की समस्या: भीषण गर्मी में वाहनों का लाइनअप न होने से घंटों जाम लग रहा है।
सुरक्षा राम भरोसे: सीसीटीवी कैमरों की भारी कमी है, रात की गश्त ठप है और असामाजिक तत्वों का डेरा है। हद तो तब हो गई जब पिछले दिनों एक विक्षिप्त व्यक्ति ने एक व्यापारी को काट खाया।
3. कचरा घर बना गार्डन, महापुरुषों का अपमान

मंडी का इकलौता गार्डन अब कबाड़खाना बन चुका है।
महापुरुषों के स्मारकों के नीचे गंदगी का अंबार है, पत्थरों में दरारें आ चुकी हैं और झाड़ियां उग आई हैं।
चारों तरफ गुटखे के पाउच, प्लास्टिक और खाली बोतलें बिखरी हैं। बैठने की बेंचें टूट चुकी हैं और बीचोबीच पुराने लोहे के केबिन लावारिस फेंके गए हैं।
’तीखी खबर’ के सीधे सवाल:
करोड़ों का बजट मंडी समिति आखिर कर क्या रही है?
क्या किसान, व्यापारी और मासूम बच्चे सिर्फ शोषण के लिए हैं?
क्या प्रशासन इन बच्चियों को इस बंधुआ जैसे काम से मुक्त कराकर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या किसी बड़े हादसे का इंतजार है?
मंडी प्रशासन जवाब दे!
