
योगेश पवार
आज 21 जून है। दुनिया भर में गद्दे बिछ चुके हैं, सफेदी चमकाते ब्रैंडेड टी-शर्ट पहने जा चुके हैं, और कैमरे बिल्कुल सही एंगल पर सेट हैं क्योंकि आज ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ है। तो चलिए, आज इस वैश्विक उत्सव में अपने चश्मे को थोड़ा साफ करते हैं और देखते हैं कि हमारा आम आदमी इस योगासन की राजनीति और महंगाई के बीच कौन से ‘आसन’ कर रहा है।
”अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और आम आदमी का पेट!”
अनुलोम-विलोम: सांसों का खेल या बजट का मेल?
मंच से गुरु जी दहाड़ रहे हैं—”सांस अंदर खींचिए… और बाहर छोड़िए।”
पार्क के कोने में बैठा आम आदमी सोच रहा है कि उसे तो बिना किसी गुरु के ही सालों से ‘अनुलोम-विलोम’ की आदत है। जब जेब से पैसे ‘बाहर’ जाते हैं, तो वह मजबूरी में अपनी सांस ‘अंदर’ खींच लेता है।
चश्मे का लेंस: अंतर बस इतना है कि टीवी वाले बाबाओं का पेट अंदर-बाहर होता है, और यहाँ आम आदमी का घरेलू बजट ऊपर-नीचे होता है। टमाटर, प्याज और पेट्रोल के दाम देखकर आम आदमी की सांसें वैसे ही इतनी अटक जाती हैं कि उसे किसी और प्राणायाम की जरूरत ही नहीं बचती!
‘कपालभाति’ और खाली खोपड़ी का झटका
कहा जाता है कि कपालभाति से चेहरे पर चमक आती है। हमारे संता जी रोज सुबह पेट को झटके दे-देकर कपालभाति करते हैं। चेहरे पर चमक तो नहीं आई, हाँ… पेट को झटका लगते ही बिजली का बिल, बच्चों की स्कूल फीस और मकान मालिक का चेहरा जरूर घूम जाता है।
आम आदमी का ‘कपाल’ (खोपड़ी) तो वैसे ही दिन-रात इस चिंता में चमकता रहता है कि अगले महीने की EMI कहाँ से आएगी। उसका दिमाग बिना ‘शीर्षासन’ किए ही इतना घूम चुका है कि वैज्ञानिक भी हैरान हैं।
सबसे बड़ा आसन: ‘कतार-आसन’
योग शास्त्रों में भले ही इसका जिक्र न हो, लेकिन भारतीय आम आदमी इस आसन में ‘इंटरनेशनल मास्टर’ है:
राशन की दुकान पर सीधे खड़े रहना: राशन-आसन।
सरकारी दफ्तर में बाबू के सामने झुकना: बाबू-नमस्कार।
पानी के टैंकर के पीछे बाल्टी लेकर दौड़ना: मटका-आसन।
यह वो योग है जो आम आदमी सिर्फ 21 जून को नहीं, बल्कि साल के 365 दिन करता है ताकि व्यवस्था के सामने उसके पैर मजबूत रहें।
कैमरे का ‘योग’ और नेताओं का ‘भोग’
आज सोशल मीडिया खोलिए, हर तरफ ‘फेसबुकिया-आसन’ नजर आएगा। योग कम, ‘फोटोग्राफी’ ज्यादा हो रही है। एंगल ऐसा होना चाहिए कि पेट कम और ‘पब्लिसिटी’ ज्यादा दिखे।
काश! हमारे नेताओं की रीढ़ की हड्डी जनता के काम करने में भी उतनी ही लचीली होती, जितनी आज कैमरे के सामने ‘भुजंगासन’ करते वक्त दिख रही है।
आज का तीखा ज्ञान:
योग दिवस पर दो मिनट सांस रोकना बहुत आसान है हुजूर… असली ‘योग’ तो वो आम आदमी कर रहा है जो पूरी जिंदगी ‘आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया’ के बीच संतुलन बनाने के लिए पतली रस्सी पर सर्कस कर रहा है।
तो साथियों, आज एक दिन का योग जरूर कीजिए, ताकि बाकी के 364 दिन इस सिस्टम के दिए हुए ‘आसनों’ को सहने की शक्ति बनी रहे!
बोलिए… ओऽऽऽम… शांति! (या फिर… ओऽऽऽम… महंगाई!)
