
मंदसौर:
दशहरे के दिन जहां पूरा देश रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों को धू-धू कर जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है, वहीं मध्य प्रदेश के मंदसौर में तस्वीर बिल्कुल उलट होती है। यहां रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि पूरे मान-सम्मान के साथ उसकी पूजा की जाती है। वजह बेहद दिलचस्प है—मंदसौर को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है, जिसके चलते शहरवासी रावण को अपना ‘दामाद’ मानते हैं!
मायके का मान: जब ‘विलेन’ बन जाए पाहुना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण की पत्नी मंदोदरी का जन्म स्थान (पीहर) मंदसौर (तत्कालीन मन्दोदरीय) में था। इस रिश्ते के नाते रावण इस शहर का दामाद (जमाई) हुआ। यही वजह है कि यहां के खानपुरा क्षेत्र में स्थापित रावण की 51 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा को जलाने के बजाय उसकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।
आज भी परंपरा में ज़िंदा है ‘घूंघट’ का लिहाज
इस अनोखी परंपरा की सबसे खास बात यहां की महिलाओं की आस्था और मर्यादा से जुड़ी है। आज भी जब खानपुरा क्षेत्र में स्थित रावण की प्रतिमा के सामने से कोई महिला या बहू-बेटियां गुजरती हैं, तो वे परिवार के बड़े-बुजुर्गों की तरह सम्मान में घूंघट (पर्दा) निकाल लेती हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी ग्रामीण और शहरी संस्कृति के अनूठे मेल को दर्शाती है।
नामदेव समाज निभाता है विशेष जिम्मेदारी
दशहरे के पावन पर्व पर मंदसौर का नामदेव समाज इस परंपरा को मुख्य रूप से आगे बढ़ाता है। समाज के लोग रावण की प्रतिमा के समक्ष एकत्र होकर दीप जलाते हैं, आरती उतारते हैं और ढोल-नगाड़ों के साथ उत्सव मनाते हैं। दुनिया जहां दशानन के पुतले को भस्म करती है, वहीं मंदसौर के लोग अपने ‘पाहुने’ (दामाद) का भव्य स्वागत कर एक अनोखी मिसाल पेश करते हैं।
