
रतलाम/शिवपुर ( दशरथ सोलंकी ) कृषि क्षेत्र से एक ऐसी सुखद तस्वीर सामने आ रही है जो पर्यावरण और खेती दोनों के लिए मिसाल है। शिवपुर, रामपुरिया, लुनेरा और बंबोरी जैसे गांवों के किसानों ने एक अनोखी और लाभदायक मुहिम शुरू की है। अब खेतों में गेहूं की कटाई के बाद बचने वाले अवशेष यानी ‘नरवाई’ को जलाया नहीं जा रहा, बल्कि उसे ‘सोना’ बनाया जा रहा है।
तकनीक और सूझबूझ का संगम किसान अब हार्वेस्टर के साथ-साथ रीपर (Reaper) तकनीक का सहारा ले रहे हैं। इस तकनीक से: पशुओं को मिला आहार: गेहूं के डंठल से बेहतरीन भूसा तैयार किया जा रहा है, जो दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक चारा बन रहा है।
मिट्टी को मिली नई जान: जो अवशेष बच जाते हैं, उन्हें जमीन में ही जोत (हकाई) दिया जाता है। बारिश में सड़ने के बाद यह प्राकृतिक खाद का काम करती है।
”हम सुबह से रात तक डंठल से भूसा बनाने में जुटे हैं। इससे न केवल हमारे पशुओं को सालभर का भोजन मिल रहा है, बल्कि खेत की उपजाऊ शक्ति भी सुरक्षित है।” — कालू बन्ना, प्रगतिशील किसान
गौ-सेवा की अनूठी मिसाल
इस मुहिम में केवल निजी स्वार्थ नहीं, बल्कि सेवा भाव भी छुपा है। किसान गोवर्धन मुनिया बताते हैं कि क्षेत्र के जागरूक किसान अपनी जेब से खर्च कर हर साल 200 से 300 ट्रॉली भूसा गौशालाओं को दान कर रहे हैं। यह कदम बेसहारा पशुओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
नरवाई जलाने से जमीन का तापमान बढ़ता है और मिट्टी के मित्र सूक्ष्म जीव (जैसे केंचुए और लाभकारी बैक्टीरिया) खत्म हो जाते हैं। किसानों के इस ‘अनोखे तरीके’ से अब: वायु प्रदूषण में भारी कमी आएगी।
खेतों की ‘ऑर्गेनिक कार्बन’ क्षमता बढ़ेगी।
किसानों को बाजार से महंगा भूसा खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
निष्कर्ष: अन्नदाता का यह नया अवतार बता रहा है कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो हम आधुनिक मशीनों का सही उपयोग कर प्रकृति को भी बचा सकते हैं और अपनी आय भी बढ़ा सकते हैं।
