
रतलाम। वेस्टर्न रेलवे के रतलाम जंक्शन पर पिछले 5 दिनों से करंट से झुलस रहे एक बंदर का मामला वन विभाग के दावों की पोल खोलने वाला साबित हुआ है। वन्यजीव सुरक्षा के नाम पर लाखों का बजट खर्च करने वाले विभाग की टीम जब मौके पर पहुंची, तो उसके पास बंदर को पकड़ने के लिए एक ‘जाल’ तक नहीं था। बिना तैयारी के आई टीम के कारण आखिरकार बेजुबान बंदर तड़पता हुआ मौके से भाग गया।
न गन, न डॉक्टर; सिर्फ तमाशा देखती रही टीम
मामले की गंभीरता को देखते हुए ‘केन हेल्पिंग हैंड फाउंडेशन’ के फाउंडर विशाल उपाध्याय और सहयोगी यशवंत पूरी मेडिकल किट के साथ पहुंचे और अपनी जान जोखिम में डालकर बंदर को प्राथमिक इंजेक्शन दिए। लेकिन पूरी तरह इलाज के लिए वन विभाग की जरूरत थी। हैरान करने वाली बात यह रही कि मौके पर पहुंची फॉरेस्ट टीम के पास:
बंदर को पकड़ने का कोई रेस्क्यू जाल नहीं था।
बेहोश करने के लिए ट्रैंक्विलाइज़र गन नदारद थी।
आपातकालीन स्थिति के लिए कोई पशु चिकित्सक (वेटनरी डॉक्टर) साथ नहीं था।
बिना संसाधनों के आई टीम सिर्फ मूकदर्शक बनी रही और सहमा हुआ बंदर स्टेशन परिसर में ही कहीं और भाग गया, जिसकी पूंछ से लगातार खून बह रहा है।
डिप्टी रेंजर के पास नहीं थी ID, RPF-GRP के सामने हंगामा
स्टेशन पर भीड़ जुटने के बाद जब माहौल बिगड़ने लगा, तो GRP और RPF की टीमें भी मौके पर पहुंचीं। जब फाउंडेशन के सदस्यों और सुरक्षाबलों ने फॉरेस्ट टीम का नेतृत्व कर रहे व्यक्ति से उनका सरकारी पहचान पत्र (ID) मांगा, तो वे बगलें झांकने लगे। खुद को ‘डिप्टी रेंजर’ बताने वाले महोदय के पास कोई वैध ID नहीं थी और वे जंगल का कोई गलत-सलत कागज दिखाकर पल्ला झाड़ते नजर आए।
इस घटना ने रतलाम वन विभाग की कार्यप्रणाली और वन्यजीव सुरक्षा के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
