
रतलाम, 15 अगस्त: आज जब पूरा देश और हमारा रतलाम शहर आजादी की वर्षगांठ का जश्न मना रहा है, हर तरफ तिरंगा लहरा रहा है और देशभक्ति के गीत गूंज रहे हैं, वहीं शहर के बीचों-बीच स्थित एक ऐतिहासिक स्मारक अपनी बदहाली और अपमान पर आंसू बहा रहा है। यह वह स्मारक है, जो हमें याद दिलाता है कि यह आजादी हमें कितनी मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली है।
हम बात कर रहे हैं रतलाम विकास खंड (Ratlam Block) के उस स्वतंत्रता संग्राम स्मारक (Freedom Fighters Memorial) की, जिसे भारत की आजादी के 25 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर स्थापित किया गया था। इस स्मारक के दो शिलालेख, जो कभी गर्व से चमकते थे, आज धूल, गंदगी और कचरे के ढेर के बीच दबे हुए हैं।
संविधान की उद्देशिका पर गंदगी का प्रहार:
इस स्मारक के बाएं (Left) शिलालेख पर भारत के संविधान की पवित्र प्रस्तावना (Preamble) उत्कीर्ण है। वह प्रस्तावना, जो हमारे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों – न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता – की नींव है। लेकिन आज, इस पवित्र लेख के ठीक सामने कूड़े का ढेर लगा है। स्मारक के आसपास जमा गंदा पानी और कीचड़ इसकी दीवारों से चिपक गया है। जिस संविधान को 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया था, उसका यह हाल देखना हर देशप्रेमी के लिए हृदयविदारक है।
- शहीदों के नामों का अपमान:
स्मारक का दायां (Right) शिलालेख, जिस पर रतलाम विकास खंड के उन महान शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, आज गुमनामी और अपमान के अंधेरे में खो गया है। शिलालेख के ठीक सामने पुरानी टीन की चादरें, लकड़ी के फट्टे और लोहे के बक्से लावारिस पड़े हुए हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी ने इस जगह को कबाड़खाना बना दिया हो। उन नामों के सामने कचरा पड़ा होना, जिन्होंने हमारे भविष्य के लिए अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया, हमारे लिए डूब मरने जैसी बात है।
प्रशासन की घोर लापरवाही:
यह स्मारक न केवल एक ऐतिहासिक स्थल है, बल्कि यह हमारे शहर की विरासत और देशभक्ति का प्रतीक है। लेकिन इसकी वर्तमान स्थिति प्रशासन की घोर लापरवाही और उदासीनता को उजागर करती है। 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्व पर भी इस स्मारक की सफाई न होना, यह दर्शाता है कि हमारे जन प्रतिनिधियों और अधिकारियों के मन में हमारे शहीदों और संविधान के प्रति कितना सम्मान है।
एक तरफ हम स्वच्छता अभियान के बड़े-बड़े दावे करते हैं और दूसरी तरफ हमारे राष्ट्रीय स्मारकों की यह हालत है। स्मारक के पीछे बनी दीवार पर लगे स्वच्छता के स्लोगन “सर्वेक्षण – जल है तो कल है” इस विडंबना को और गहरा कर देते हैं।
एक कड़वा सवाल:
आज जब हम आजादी का जश्न मना रहे हैं, हमें खुद से एक कड़वा सवाल पूछना होगा: क्या यही है वह सम्मान, जो हम अपने देश के संविधान और उन शहीदों को दे रहे हैं, जिन्होंने हमें यह आजादी दिलाई? क्या हमारा फर्ज सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराना है?
निष्कर्ष:
इस स्मारक की बदहाली न केवल हमारे शहर के लिए शर्मनाक है, बल्कि यह हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान पर एक धब्बा है। प्रशासन को तुरंत इस पर संज्ञान लेना चाहिए और स्मारक की सफाई और जीर्णोद्धार का काम शुरू करना चाहिए। अगर हम अपने स्मारकों का सम्मान नहीं कर सकते, तो हमें आजादी का जश्न मनाने का कोई हक नहीं है।
