
नई दिल्ली/रेलवे डेस्क: भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है। हर दिन लाखों यात्री ट्रेन से सफर करते हैं। लेकिन टिकट बुक करते समय अक्सर लोगों के मन में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर रेलवे में सीटों का आवंटन (Seat Allocation) कैसे होता है? क्यों कभी टिकट बुक करते ही वेटिंग लिस्ट (WL) मिल जाती है, तो कभी अचानक कन्फर्म सीट मिल जाती है?
आइए जानते हैं रेलवे के इस पूरी तरह से ऑटोमैटिक और पारदर्शी रिजर्वेशन सिस्टम का पूरा खेल।
कोई इंसान नहीं, कंप्यूटर सिस्टम करता है फैसला
सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि रेलवे में सीट आवंटन पूरी तरह से कंप्यूटर सिस्टम द्वारा किया जाता है। इसमें किसी भी व्यक्ति का कोई मानवीय हस्तक्षेप नहीं होता। जब आप टिकट बुक करते हैं, तो कंप्यूटर सिस्टम मुख्य रूप से इन 6 चीजों को चेक करता है:
कोटा (Quota): आप किस कैटेगरी के तहत टिकट बुक कर रहे हैं।
यात्रा की दूरी (Distance): सिस्टम हमेशा कोशिश करता है कि ज्यादा दूरी वाले यात्रियों को पहले सीट मिले, ताकि सीट का पूरा उपयोग हो सके।
बोर्डिंग स्टेशन (Boarding Point): आपकी ट्रेन यात्रा कहां से शुरू हो रही है।
गंतव्य स्टेशन (Destination): आपको कहां तक जाना है।
श्रेणी (Class): स्लीपर, थर्ड एसी, सेकेंड एसी या अन्य।
उपलब्ध सीटें (Available Seats): उस समय ट्रेन में कितनी सीटें खाली हैं।
रेलवे के प्रमुख कोटे: किसे कहां मिलती है प्राथमिकता?
ट्रेन में हर वर्ग के यात्रियों की सुविधा के लिए अलग-अलग कोटे निर्धारित किए गए हैं, जैसे:
सामान्य कोटा (General Quota)
तत्काल कोटा (Tatkal Quota)
महिला कोटा (Ladies Quota)
वरिष्ठ नागरिक कोटा (Senior Citizen Quota)
दिव्यांग कोटा (Divyangjan Quota)
रक्षा कोटा (Defense Quota)
विदेशी पर्यटक कोटा (Foreign Tourist Quota)
लोअर बर्थ (Ниचली सीट) किसे पहले मिलती है?
रेलवे के सॉफ्टवेयर में यह नियम तय है कि निचली बर्थ (Lower Berth) हमेशा प्राथमिकता के आधार पर वरिष्ठ नागरिकों, गर्भवती महिलाओं, 45 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं और दिव्यांग यात्रियों को ही अलॉट की जाए।
RAC और वेटिंग लिस्ट (Waiting List) कैसे बनती है?
सॉफ्टवेयर में सीटों के भरने का एक तय क्रम (Sequence) होता है:
स्टेप 1: सबसे पहले ट्रेन की सभी पक्की (Confirm) सीटें भरी जाती हैं।
स्टेप 2: सभी पक्की सीटें भरने के बाद RAC (Reservation Against Cancellation) शुरू होता है, जिसमें एक सीट पर दो यात्रियों को बैठने की जगह मिलती है।
स्टेप 3: RAC की सीमा खत्म होने के बाद ही प्रतीक्षा सूची (Waiting List) शुरू होती है।
स्टेप 4: ट्रेन छूटने के कुछ घंटे पहले जब चार्ट बनता है, तब सीटों की अंतिम स्थिति अपडेट होती है और वेटिंग या RAC वाले यात्रियों की सीटें कन्फर्म होती हैं।
एक ही सीट, अलग-अलग यात्री: जानिए ‘स्प्लिट बुकिंग’ का खेल
कई बार यात्रियों को लगता है कि उनके सामने ही कोई सीट खाली हो गई लेकिन उन्हें नहीं मिली। दरअसल, रेलवे का सिस्टम एक ही सीट को अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग यात्रियों को भी आवंटित करता है। इसे ऐसे समझिए:
यात्री A: रात 10 बजे तक (स्टेशन X से स्टेशन Y तक)
यात्री B: रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक (स्टेशन Y से स्टेशन Z तक)
यात्री C: सुबह 6 बजे के बाद (स्टेशन Z से आगे)
Inside News India Fact Check: रेलवे का यह पूरा सिस्टम पूरी तरह से निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वचालित (Automated) है। इसका एकमात्र उद्देश्य यही है कि हर यात्री को उसका हक मिले और ट्रेन की हर सीट का सही और पूरा उपयोग हो सके। अगली बार जब आप टिकट बुक करें, तो इस गणित को जरूर ध्यान में रखें!
