
आजकल हवाओं में ‘त्याग’ और ‘कर्तव्य’ की बड़ी खुशबू तैर रही है, लेकिन अफसोस कि इसकी सारी जिम्मेदारी सिर्फ उस आम आदमी के कंधों पर डाल दी गई है जो पहले से ही महंगाई की चक्की में पिस रहा है। जब भी देश पर कोई संकट आता है या खजाना खाली होता है, तो सारा ‘ज्ञान’ आम जनता की झोली में डाल दिया जाता है। हमसे कहा जाता है कि सब्सिडी छोड़ दो, टैक्स बढ़ा लो, सादगी अपनाओ और देशहित में भूखे सो जाओ। पर क्या यह ‘देशहित’ का पाठ सिर्फ उन लोगों के लिए है जो कतारों में खड़े हैं? क्या सफेदपोश गलियारों में बैठे हमारे रहनुमाओं पर यह नियम लागू नहीं होते?
आम आदमी की चीख है जो देख रहा है कि उपदेश देने वाली सरकार खुद कितनी विलासिता में डूबी है। एक तरफ हमें सादगी की शिक्षा दी जाती है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी उत्सवों और भव्य आयोजनों में जनता की गाढ़ी कमाई पानी की तरह बहाई जाती है। जनता पूछ रही है कि अगर देश संकट में है, तो क्या नेताओं के वेतन, भत्तों और पेंशन पर एक साल का ताला नहीं लग सकता? क्या समाज सेवा का जज्बा सिर्फ चुनाव जीतने तक ही सीमित है?
अजीब विडंबना है! रैलियों में हजारों की भीड़ जुटाने के लिए करोड़ों फूंके जा सकते हैं, लेकिन जब खर्चे कम करने की बात आती है तो डिजिटल रैलियां और ऑनलाइन भाषण नेताओं को रास नहीं आते। विदेशी दौरों और शाही डेलिगेशन पर रोक लगाने की बात हो या वीआईपी काफिलों के सायरन बंद करने की, सत्ता के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। भव्य होटलों में होने वाली सरकारी बैठकों का बिल तो आम आदमी के पसीने से ही भरा जाता है।
सच तो यह है साहब, कि आज के दौर में ‘अपना खून खून और जनता का खून पानी’ हो गया है। जब त्याग की बारी आती है, तो नेताजी ‘आम आदमी’ को आगे कर देते हैं, और जब मलाई की बारी आती है, तो वही आम आदमी गेट के बाहर खड़ा रह जाता है।
अगर देश को वाकई मजबूत बनाना है, तो शुरुआत उन कुर्सियों से होनी चाहिए जहाँ से कानून बनते हैं। सादगी का उपदेश देने से पहले, जरा अपने वीआईपी कल्चर के उस भारी-भरकम ‘चश्मे’ को उतार कर देखिए, शायद तब आपको आम आदमी की तकलीफ साफ नजर आए।
