
चश्मा पहनकर देखा तो क्या दिखा?
आजकल टीवी और बड़े मीडिया चैनलों पर यह खबर बहुत जोर-शोर से तैर रही है कि जिस दवा की लागत महज 10 या 20 रुपए होती है, उस पर MRP का ठप्पा 400 से 500 रुपए का लगा दिया जाता है। लेकिन यह खेल सिर्फ अस्पतालों या मेडिकल स्टोर तक ही सीमित नहीं है—अगर देखना हो तो त्योहारों के दौरान पटाखों के बाजार में जाकर देखिए!
पटाखों के डिब्बे पर छपा होता है: MRP – ₹2000, और दुकानदार बड़े अहसान के साथ कहता है—”भाई साहब, आपके लिए 80% डिस्काउंट! सिर्फ ₹400 में ले जाओ।”
अब जरा सोचिए, जो चीज ₹400 में बेचने के बाद भी दुकानदार और कंपनी को मुनाफा दे रही है, उसकी असली लागत क्या होगी? और अगर ₹400 सही कीमत है, तो उस पर ₹2000 का झूठ छापने का हक इन कंपनियों को किसने दिया?
यह सीधे-सीधे जनता को भ्रमित करना और उनकी जेब पर डाका डालना है।
बीच के चक्रव्यूह में कौन पिस रहा है?
दुकानदार का जवाब: “हम क्या करें जी, डिब्बे पर जो MRP लिखा है, हम तो उसी के हिसाब से बेच रहे हैं।”
कंपनी (मैन्युफैक्चरर) का जवाब: “हमारी लागत, ट्रांसपोर्ट, कमीशन और विज्ञापन का खर्चा बहुत है।”
इस पूरे घटिया खेल में सब अपना पल्ला झाड़कर निकल जाते हैं और आखिर में जेब किसकी कटती है? उसी सीधे-साधे आम आदमी की! दवाइयों के नाम पर मजबूरी का फायदा उठाया जाता है, तो पटाखों के नाम पर खुशी मनाने के अहसास को लूटा जाता है।
सरकार और व्यवस्था से सीधे व तीखे सवाल
लागत के आधार पर MRP तय क्यों नहीं?
क्या सरकार का कोई ऐसा नियम-कानून नहीं होना चाहिए कि किसी भी वस्तु की मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट (वास्तविक लागत) पर एक निश्चित प्रतिशत मुनाफा तय करके ही उसकी MRP छापी जाए?
मनमानी MRP छापने का अधिकार किसने दिया?
क्या इन कंपनियों को कुछ भी ऊंट-पटांग अंक छापने की खुली छूट दे दी गई है? 10 रुपए की चीज पर 500 रुपए लिखना जनता के साथ सीधा धोखा और लूट नहीं है तो और क्या है?
क्या सरकार की आंखें मूंद रखी हैं?
दवाइयों से लेकर पटाखों और इलेक्ट्रॉनिक सामानों तक, हर सेक्टर में यह अंधेरगर्दी सरेआम चल रही है। क्या इस लूट-तंत्र पर सरकार की नजर नहीं पड़ती, या फिर देखकर भी अनजान बनने का नाटक किया जा रहा है?
निष्कर्ष
आम आदमी खून-पसीने की कमाई से पाई-पाई जोड़ता है, और बाजार में उसे ‘MRP और डिस्काउंट’ के मायाजाल में फंसाकर लूट लिया जाता है। समय आ गया है कि सरकार इस मनमानी MRP प्रथा पर नकेल कसे और लागत-आधारित मूल्य निर्धारण (Cost-Based Pricing) का पारदर्शी नियम बनाए।
वरना वह दिन दूर नहीं जब कंपनियां हवा के पैकेट पर भी ₹1000 MRP छापेंगी और ₹200 में बेचकर कहेंगी—”लीजिए, 80% की भारी छूट!”
