
त्योहारों की आहट सुनते ही हमारे देश में दो चीजें अचानक चरम पर पहुँच जाती हैं—पहली, बाज़ार में मिठाइयों की चमक और दूसरी, मिलावटियों की क्रिएटिविटी।
पहले ज़माने में मिलावट भी सादगी से होती थी। दूध में पानी मिलाया तो लगता था कि चलो, बंदा ईमानदार है, कम से कम पानी तो साफ़ डाल रहा होगा। लेकिन आज का दौर ‘डिजिटल मिलावट’ का है। अब पनीर दूध से नहीं, सीधे केमिकल और डिटर्जेंट के ‘अद्भुत संगम’ से प्रकट होता है। खोया कम और मैदा-यूरिया का मिश्रण ज़्यादा बिकता है।
ऊपर से सोने पर सुहागा है—डिब्बे पर छपा ‘100% शुद्ध और प्रामाणिक’ का चमचमाता ‘ब्रांडेड’ सील।
आम आदमी जब दुकान पर जाता है, तो दुकानदार बड़े फक्र से कहता है, “अरे सेठ जी, यह कोई आम मावा नहीं है, कॉर्पोरेट लेवल का मावा है! बिल्कुल आईएसओ सर्टिफाइड!” आम आदमी भी मासूमियत में सोचता है कि जब पैकेट इतना सुंदर है और दाम इतना भारी है, तो ज़हर भी क्वालिटी वाला ही होगा।
त्योहार के दो दिन बाद जब पेट में मरोड़ उठती है और डॉक्टर के क्लीनिक के बाहर लाइन लगती है, तब समझ आता है कि ‘100% शुद्ध’ का असली मतलब था—’100% शुद्ध धोखा’।
प्रशासन भी पूरा मुस्तैद रहता है। त्योहार से ठीक दो दिन पहले खाद्य विभाग की ‘छापेमार’ टीमें मैदान में उतरती हैं। सैंपल लिए जाते हैं, न्यूज़ में बड़ी-बड़ी फोटो छपती हैं। लेकिन मज़ा देखिए, उन सैंपलों की लैब रिपोर्ट अक्सर अगले साल की दिवाली तक आती है! तब तक तो आम आदमी पिछला मावा पचाकर नए मावे की तैयारी कर चुका होता है।
सच तो यह है कि आज का आम आदमी लोहे का जिगर लेकर घूम रहा है। उसे पता है कि दिवाली पर दीये भले ही मिट्टी के जलें, पर पेट में केमिकल का पूरा कारखाना चल रहा है।
अब तो बस यही प्रार्थना बची है—हे प्रभु! त्योहारों पर खुशियाँ भले ही कम दे देना, पर इस ‘ब्रांडेड’ मिलावट को सहने की शक्ति ज़रूर देना!
