
आजकल सोशल मीडिया के नुक्कड़ पर ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से पास आउट कुछ महान अर्थशास्त्री छाती ठोककर दावा कर रहे हैं—”अरे भाई, सारा गन्ना तो गाड़ियों की टंकी में इथेनॉल बनकर जा रहा है, इसीलिए चाय में मिठास महंगी हो रही है!”
ऐसे ही एक ज्ञानी चचा चौराहे पर गन्ने का रस चूसते हुए देश का बजट तैयार कर रहे थे। हमने चश्मा थोड़ा नीचे खिसकाया और पूछा—”चचा, कभी गन्ने का खेत देखा है या सीधे चाय की पत्ती में ही मिठास खोज लेते हो? अगर इथेनॉल न बनता, तो आज चाय में चीनी की जगह गुड़ घोलकर पीना पड़ता!”
अब जरा इन ‘विशेषज्ञों’ को गन्ने की पूरी जन्मपत्री समझाइए:
10 किलो गन्ना = 1 किलो चीनी: जब 100 किलो गन्ना मिल में पिसता है, तो बेचारी चीनी तो सिर्फ 10 किलो ही निकलती है। बाकी जो बचता है, वह है—खोई (बेगास), मैली और गाढ़ा काला शीरा (मोलेसेस)।
खोई और मैली का जलवा: खोई से कागज और स्पीकर के बॉक्स बनते हैं, और मैली से बनती है खेत की खाद।
शीरे का कड़वा सच: पहले इस शीरे से थोड़ी-बहुत शराब या स्पिरिट बनती थी। खपत कम थी, तो मिल वाले इसे बड़े-बड़े गड्ढों में सड़ाते थे या नालों में बहा देते थे। बदबू ऐसी कि कौवे भी रास्ता बदल लें!
अब जरा गणित समझिए! जब से इस बेकार फेंके जाने वाले शीरे से इथेनॉल बनाकर पेट्रोल में मिलाना शुरू हुआ, तब से चीनी मिलों की लॉटरी लग गई। जो कचरा कल तक नाले में बह रहा था, वह आज कड़क नोट छापकर दे रहा है।
अगर इथेनॉल बिकना बंद हो जाए और मिलों की यह कमाई रुक जाए, तो चीनी ₹100 प्रति किलो का आंकड़ा ऐसे पार करेगी जैसे बिना ब्रेक की गाड़ी!
तो भैया, जो लोग चिल्ला रहे हैं कि इथेनॉल की वजह से चीनी महंगी हो रही है, उन्हें गन्ने का रस पिलाइए और कहिए—ज्ञान बांटने से पहले थोड़ा अर्थशास्त्र का ‘घोल’ भी पी लिया करो। वरना बिना हाथ-पैर के कुतर्क करोगे, तो लोग चाय की चीनी कम और आपकी बातों पर ठहाके ज्यादा लगाएंगे!
