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कहते हैं लोकतंत्र में जनता जनार्दन होती है और उसके चुने हुए प्रतिनिधि उस जनार्दन की आवाज। लेकिन इन दिनों रतलाम की फिजाओं में लोकतंत्र का एक नया और अनोखा ‘अपग्रेडेड वर्जन’ देखने को मिल रहा है। इस वर्जन का नाम है—”नौकरशाही का चश्मा और नेताओं की बेबसी!” ‘आम आदमी का चश्मा’ लगाकर जब हम रतलाम के हालिया घटनाक्रमों को देखते हैं, तो समझ नहीं आता कि हंसें या अपनी किस्मत पर रोएं। विपक्ष के नेताओं की सुनवाई न हो, तो समझ आता है कि चलो भाई, सत्ता का रसूख आड़े आ रहा होगा। लेकिन जब खुद सत्ताधारी दल के ‘दिग्गज’ और जनता के वोटों से चुनकर आए ‘माननीय’ सरकारी दफ्तरों की चौखट पर गिड़गिड़ाने लगें या फर्श पर बैठने को मजबूर हो जाएं, तो मामला गंभीर भी है और दिलचस्प भी।
’सुनवाई नहीं’ का लगा तगड़ा ‘हैट्रिक’
रतलाम में नौकरशाही के बुलंद हौसलों की कहानी बयां करने के लिए अब किसी गवाह की जरूरत नहीं है, खुद सत्ता पक्ष के नेताओं की तस्वीरें गवाही दे रही हैं।
पहला नजारा: जिला पंचायत अध्यक्ष महोदया, जिनके पास पूरे जिले की ग्रामीण सरकार का जिम्मा है, वो सिस्टम के सामने खुद को इतना ‘छोटा’ महसूस करती हैं कि उनकी ‘सुनवाई ही नहीं’ होती।
दूसरा नजारा: आलोट विधायक और उनके साथ जुटे जनप्रतिनिधियों का पूरा हुजूम। जनता ने इन्हें अपनी आवाज बुलंद करने के लिए भेजा था, लेकिन ‘साहब’ के दफ्तर में इनकी आवाज ऐसी दबी कि इन्हें खुद के होने पर ही शक होने लगा।
तीसरा और सबसे ताजा नजारा: पूर्व गृहमंत्री श्री हिम्मत कोठारी जी का! जो शख्स कभी पूरे प्रदेश की पुलिस और कानून व्यवस्था का ‘कंट्रोल रूम’ हुआ करता था, उन्हें रतलाम के एक दफ्तर की जमीन पर पालथी मारकर बैठना पड़ गया। जब एक पूर्व गृहमंत्री को अपनी बात मनवाने या ध्यान खींचने के लिए फर्श का सहारा लेना पड़े, तो समझ जाइए कि रतलाम की नौकरशाही इस समय ‘सातवें आसमान’ पर सैर कर रही है।
कौन है वो ‘अदृश्य शक्ति’?
बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन कुर्सियों पर बैठे अफसरों को इतनी ‘पावर’ सप्लाई कहां से हो रही है? कौन सी ऐसी ‘अदृश्य शक्ति’ है जो मंत्रियों, विधायकों और पंचायत अध्यक्षों के प्रोटोकॉल को रद्दी का टुकड़ा समझकर डस्टबिन में डाल रही है?
लोकतंत्र का बुनियादी नियम कहता है कि जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि सर्वोपरि है क्योंकि उसके पीछे जनता का जनादेश है। लेकिन रतलाम के सरकारी दफ्तरों में घुसते ही यह जनादेश शायद ‘साइलेंट मोड’ पर चला जाता है। यहाँ ‘आदेश’ नहीं चलता, यहाँ नेताओं को भी ‘गिड़गिड़ाना’ पड़ता है या फिर धरने पर बैठना पड़ता है।
तो फिर… ‘आम आदमी’ का क्या होता होगा?
अब जरा उस आम आदमी की सोचिए, जिसके पास न तो कोई ‘लेटरहेड’ है, न गाड़ियों पर लगी ‘नेमप्लेट’ और न ही आगे-पीछे चलने वाले कार्यकर्ताओं की फौज।
जब जिला पंचायत अध्यक्ष की ‘सुनवाई नहीं’ होती, जब विधायक जी को अनसुना कर दिया जाता है, और जब पूर्व गृहमंत्री को फर्श नसीब होती है… तो उस गरीब किसान, मजदूर या आम नागरिक का क्या हाल होता होगा जो अपनी फटी जेब में एक अदद आवेदन लेकर इन दफ्तरों के चक्कर काटता है? उसका तो कोई ‘गॉडफादर’ भी नहीं है! उसके लिए तो इन दफ्तरों की सीढ़ियां ही एवरेस्ट की चढ़ाई जैसी हो जाती होंगी।
आखरी चश्मा
तस्वीर साफ है—रतलाम में जनप्रतिनिधि बौने साबित हो रहे हैं और नौकरशाही इतनी हावी हो चुकी है कि उसे जनता के दर्द से ज्यादा अपनी कुर्सी की ठसक प्यारी है। अगर सत्ताधारी दल के सूरमाओं का यह हाल है, तो जनता सचमुच पूछ रही है—”आखिर आम नागरिक की कौन सुनेगा?” शायद ‘साहब’ लोग भूल गए हैं कि कुर्सियां बदलती रहती हैं, लेकिन जनता और उसका ‘चश्मा’ हमेशा वहीं रहता है। देखना है कि इस तीखे चश्मे की रोशनी भोपाल तक कब पहुंचती है!
