
राजनीति के खेल भी निराले हैं। आजकल हमारे शहर का तापमान भले ही कम हो, लेकिन सियासी गलियारों का पारा कुछ ज्यादा ही गर्म है। सुना है, हाल ही में हमारे शहर के एक नेताजी का भोपाल में दरबार सजा। अब दरबार था, तो शहर के हाल-चाल पर चर्चा तो होनी ही थी।
शहर के पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को लेकर लोगों ने सीधे ऊपर तक गुहार लगा दी। शिकायत इतनी जोर की थी कि दरबार में बैठे हुक्मरानों का पारा भी सातवें आसमान पर पहुँच गया।
अब चर्चा यह है कि शहर में कुछ बड़े ओहदों पर बैठे लोगों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी करनी पड़ सकती है।
हम नाम तो बिल्कुल नहीं लेंगे, क्योंकि हम तो ठहरे आम आदमी—और “समझदारों के लिए इशारा ही काफी होता है।”
लोग गलियों में चर्चा कर रहे हैं कि आखिर कौन किससे परेशान है?
दीवारों के भी कान होते हैं, और उन्होंने बहुत कुछ सुन रखा है, बस हम ही हैं जो अपनी जुबान पर ताला लगाकर बैठे हैं। ज्यादा कहना मुनासिब नहीं, क्योंकि अंत में तो वही बात सच साबित होती है— “ये पब्लिक है, सब जानती है, बाबू मोशाय!”
बाकी… अब किसकी रवानगी होगी और कौन बचा रहेगा, यह तो समय ही बताएगा। हम तो बस चश्मा साफ करके तमाशा देख रहे हैं!
