आम आदमी का चश्मा: ‘डिजिटल इंडिया’ का अमर मंत्र—”सर्वर डाउन है, कल आना!”


​- योगेश पंवार


​आजकल देश में हर चीज़ ‘स्मार्ट’ और ‘डिजिटल’ हो चुकी है। राशन कार्ड से लेकर ज़मीन के पट्टे तक, सब कुछ एक क्लिक पर होने का दावा है। लेकिन जब एक आम आदमी अपना ‘देशी चश्मा’ लगाकर सरकारी दफ्तरों की चौखट पर पैर रखता है, तो उसे समझ आता है कि इस पूरे डिजिटल तंत्र का एक ही भगवान है, जिसका नाम है—”सर्वर”। और इस भगवान की सबसे बड़ी महिमा यह है कि यह अक्सर ‘डाउन’ रहता है!
​यह एक ऐसा अछूता और गंभीर विषय है, जिस पर बड़े-बड़े मंचों से कोई नहीं बोलता, लेकिन रोज़गार छोड़कर कतार में खड़ा रहने वाला आम आदमी अंदर ही अंदर घुटता है।


​’सर्वर’—काम न करने का आधुनिक और संस्कारी बहाना


​पुराने जमाने में सरकारी बाबुओं के पास काम टालने के लिए ‘साहब सीट पर नहीं हैं’ या ‘फाइल आगे बढ़ी है’ जैसे घिसे-पिटे बहाने होते थे। लेकिन अब डिजिटल युग में बाबुओं को एक बेहद संस्कारी, आधुनिक और तकनीकी बहाना मिल गया है—”ऊपर से लिंक फेल है, सर्वर काम नहीं कर रहा।”


​अब इस ‘ऊपर’ का क्या मतलब है, यह आज तक कोई नहीं समझ पाया। ऊपर भगवान हैं या भोपाल-दिल्ली में बैठा कोई कंप्यूटर, यह रहस्य आज भी बरकरार है। मज़े की बात देखिए, जब आम आदमी अपना काम कराने जाता है तो सर्वर को लकवा मार जाता है, लेकिन जैसे ही प्राइवेट दलालों या ऑनलाइन सेंटरों के ज़रिए ‘विशेष सेवा शुल्क’ के साथ फाइल आगे बढ़ती है, तो वही सर्वर अचानक चीते की रफ्तार से दौड़ने लगता है! यह कौन सी तकनीक है, इस पर तो नासा (NASA) को रिसर्च करनी चाहिए।


​आम आदमी का ‘फायदा’ (यानी जेब की सफाई)


​प्रशासन कहता है कि डिजिटल होने से जनता का समय और पैसा बच रहा है। लेकिन ज़रा चश्मा साफ करके देखिए:
​दुकान बंद, दिहाड़ी का नुकसान: एक मज़दूर या नौकरीपेशा इंसान अपना काम धंधा छोड़कर, दिनभर की मजदूरी का नुकसान उठाकर दफ्तर आता है। शाम को उसे पता चलता है कि आज ‘सर्वर’ का मूड ठीक नहीं था।


​किराए-भाड़े का ‘विशेष डिस्काउंट’: दो-चार बार चक्कर काटने में जितना पेट्रोल या बस का किराया लग जाता है, उतने में तो आदमी का काम वैसे ही हो जाना चाहिए था।
​कागज़ों का बोझ बढ़ा: कहने को डिजिटल है, लेकिन आज भी चार कॉपियां ज़ेरॉक्स (Xerox) करवाकर फाइल में लगानी ही पड़ती हैं। यानी डिजिटल का डिजिटल रहा, और कागज़ का कागज़!


​चश्मे से आखिरी बात…


​सवाल यह है कि अगर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करके भी सिस्टम का ‘सर्वर’ चौबीस घंटे डाउन ही रहना है, तो फिर इस डिजिटल तमाशे का क्या फायदा? क्यों नहीं इन सर्वर को मेंटेन करने वाली कंपनियों और ज़िम्मेदार अधिकारियों पर जुर्माना लगाया जाता? जब आम आदमी का टैक्स का पैसा समय पर ‘अपलोड’ हो जाता है, तो उसकी सहूलियत का सर्वर ‘डाउन’ क्यों रहता है?


​अगर प्रशासन सच में जनता का भला चाहता है, तो उसे विंडोज़ (Windows) से पहले अपनी ‘इच्छाशक्ति का सॉफ्टवेयर’ अपडेट करना होगा। वरना आम आदमी का यह तीखा चश्मा तो सरकारी सिस्टम के हर ‘फॉल्ट’ को यूं ही उजागर करता रहेगा।

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