आम आदमी का चश्मा: ‘बाय वन, गेट फोर’ के महाजाल में फंसा ‘मूर्ख’ महाशय


​आजकल हमारे शहर के कपड़ा बाजार में एक ऐसी सुनामी आई हुई है, जिसके आगे समंदर की लहरें भी पानी कम चाय लगें। यह सुनामी पानी की नहीं, बल्कि “लोक-लुभावन विज्ञापनों” की है। बाजार की सड़कों पर निकलिए तो बड़े-बड़े होर्डिंग्स छाती ताने आपका स्वागत करते हैं—”मात्र 1000 रुपये में चार जोड़ी कपड़े! पांच जोड़ी कपड़े! साथ में एक कच्छा-बनियान और दुकानदार की दुआएं बिल्कुल मुफ्त!”


​आम आदमी (जिसका काम ही सुबह से शाम तक हर जगह ‘सस्ता’ ढूंढना है) का दिल बाग-बाग हो जाता है। वह घरवाली और बच्चों को लेकर इस उम्मीद में दुकान में कदम रखता है कि आज तो पूरे खानदान का कायाकल्प कर देगा। लेकिन, असली खेला तो दुकान के भीतर कदम रखते ही शुरू होता है।


​खेल का पहला चरण: ‘साइज’ का मायाजाल


​जैसे ही आप उस चमचमाती दुकान में घुसकर विज्ञापन वाला बोर्ड दिखाएंगे, काउंटर पर खड़ा सेल्समैन आपको ऐसे देखेगा जैसे आप आदिमानव काल का कोई अजीब प्राणी हों।


​”अरे सर! वो जो 1000 में पांच वाला ऑफर था ना, उसमें आपका साइज तो सुबह ही खत्म हो गया। आपके साइज वाले लोग तो देश में बाढ़ की तरह आ रहे हैं। अब बस ‘हाथी’ या ‘चींटी’ के साइज के कपड़े बचे हैं।”


​खेल का दूसरा चरण: ‘नौकर की गलती, मालिक की डांट’ का ऑस्कर विनिंग ड्रामा


​चलो, आम आदमी थोड़ा और दिल छोटा करता है। सेल्समैन आपको दूसरा कपड़ा दिखाता है और बड़े प्यार से कहता है—”सर, ये सिर्फ 300 रुपये का है, ले लीजिए।” आप अपनी मेहनत की कमाई का हिसाब लगाकर, आधा घंटा ट्रायल रूम में पसीना बहाकर, कलर मैच करके खुश होते हुए काउंटर पर पहुंचते हैं।


​तभी वहां बैठे ‘सेठ जी’ (मालिक) अवतरित होते हैं। वो बिल देखते ही अपना सिर पकड़ लेते हैं और उस लड़के पर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे उसने देश का कोई गुप्त दस्तावेज लीक कर दिया हो:
“अरे रमेश! तुझे अक्ल है कि नहीं? ये 300 का नहीं, 800 का माल है! नया लड़का रख के मैं तो बर्बाद हो जाऊंगा!”


​अब आप वहां खड़े-खड़े ठगा सा महसूस कर रहे हैं। आपकी मेहनत, आपकी चॉइस, और आपका वक्त—सब पर पानी फिर चुका है। सेठ जी फिर आपको देख कर अपनी कूटनीतिक मुस्कान फेंकते हैं—”सर, नया लड़का है, गलती हो गई। अब आपने पसंद कर ही लिया है, तो चलिए आपके लिए 50-100 रुपये कम कर देते हैं।”वाह रे व्यापार! इसे ठगी कहें, जालसाजी कहें या ‘कस्टमर को बकरा बनाने की कला’?


​शासन-प्रशासन: चैन की नींद और भ्रामक विज्ञापन


​अब सवाल यह उठता है कि सरकार की बड़ी-बड़ी गाइडलाइंस किस ‘कोल्ड स्टोरेज’ में धूल फांक रही हैं? नियम तो छाती ठोक कर कहते हैं कि—”कोई भी व्यापारी भ्रामक, झूठे और गुमराह करने वाले विज्ञापनों का इस्तेमाल नहीं करेगा।”
​लेकिन हकीकत? यह सब तमाशा शासन और प्रशासन की नाक के ठीक नीचे चल रहा है। शायद प्रशासन ने अपनी नाक पर ‘भ्रष्टाचार और अनदेखी का चश्मा’ चढ़ा रखा है, जिससे उन्हें आम जनता की जेब कटती हुई दिखाई ही नहीं देती। विज्ञापन के नाम पर सरेआम लूट मची है, पर कार्रवाई के नाम पर ‘सन्नाटा’ पसरा है।


​आम आदमी इस जाल से खुद को कैसे बचाए?


​जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में मौन साधना कर ले, तो आम आदमी को खुद ही चतुर बनना पड़ेगा:
​शर्म छोड़ो, दुकान छोड़ो: जैसे ही काउंटर पर रेट बदले या ‘साइज नहीं है’ का बहाना मिले, तुरंत कपड़ा वहीं छोड़िए और बाहर निकलिए। दुकानदार आपकी ‘शर्म और मजबूरी’ का फायदा उठाता है।


​कैमरे का इस्तेमाल करें: अगर बाहर विज्ञापन कुछ और है और अंदर सच कुछ और, तो सबूत के तौर पर फोटो खींचिए।
​कंज्यूमर फोरम (Jago Grahak Jago): आजकल ऑनलाइन शिकायत (National Consumer Helpline) दर्ज करना बेहद आसान है। ऐसे भ्रामक विज्ञापनों की शिकायत दर्ज कराइए ताकि इन ‘शॉर्टकट’ से अमीर बनने वाले दुकानदारों पर नकेल कसी जा सके।
​आखिरी चश्मा: कपड़े सिलवाने से इंसान सिर्फ तन ढकता है, लेकिन इन धोखेबाज दुकानदारों के झांसे में आकर अपनी ‘अक्ल’ का ढक्कन मत बंद होने दीजिए। बाजार की इस ‘सुनामी’ से बचना है, तो विज्ञापनों के बहकावे में नहीं, अपनी जेब और विवेक के भरोसे चलिए!

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