
आजकल बाजार में एक नई किस्म का चश्मा आया है—‘दूरदर्शी चश्मा’। इस चश्मे की खासियत यह है कि इसे पहनते ही आम आदमी को तो सिर्फ गड्ढे, धूल और ट्रैफिक दिखता है, लेकिन अगर इसे कोई ‘खास रसूखदार’ पहन ले, तो उसे सीधे पांच साल बाद वहां से गुजरने वाला फोर-लेन हाईवे और उस हाईवे के किनारे उगने वाले नोटों के पेड़ दिखाई देने लगते हैं।
इसे हमारे आधुनिक नीतिशास्त्र में ‘भ्रष्टाचार’ नहीं, बल्कि ‘प्रथम परिवार का दिव्य स्वप्न विज्ञान’ कहा जाता है।
’मुखिया’ के कुनबे की अद्भुत सूझबूझ
पुरानी कहानियों में राजा-महाराजाओं को सपने आते थे कि अमुक स्थान पर खजाना गड़ा है। आधुनिक लोकतंत्र में यह वरदान हमारे ‘मुखिया’ और उनके पूरे कुनबे को ट्रांसफर हो गया है। उन्हें अचानक रात को सामूहिक सपना आता है कि अमुक सुनसान, बंजर और कौड़ियों के भाव बिकने वाली खेती की जमीन के नीचे से प्रदेश की तरक्की का मुख्य एक्सप्रेस-वे गुजरने वाला है।
अब बताइए, इसमें बेचारे मुखिया के परिजनों का क्या दोष? सपने पर तो किसी का नियंत्रण नहीं है। सुबह आंख खुलते ही मुखिया जी की धर्मपत्नी, सुपुत्र, बहू, भाई, भतीजे—यानी पूरा का पूरा ‘आत्मनिर्भर कुनबा’ जनहित में उस पूरी जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करवा लेता है।
शेयर बाजार में इसे ‘इनसाइडर ट्रेडिंग’ कहकर सीधे जेल भेज दिया जाता है, लेकिन सूबे की राजनीति में इसे ‘पारिवारिक एकता की अद्भुत मिसाल’ और ‘सबका साथ, अपनों का चकाचक विकास’ का मेडल मिलता है। जब आलोचक सवाल उठाते हैं, तो कुनबा पूरी मासूमियत से ताल ठोककर कहता है, “अब हम राज्य के सबसे बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के रिश्तेदार हैं, तो क्या देशहित में अपना रियल एस्टेट का धंधा ही बंद कर दें?” बिल्कुल सही बात है साहब, धंधा बंद नहीं होना चाहिए, भले ही राज्य की तिजोरी बंद हो जाए!
चश्मे का सच: आम आदमी रात को सपना देखता है कि उसकी सैलरी बढ़ गई या राशन सस्ता हो गया, और सुबह उठकर चाय की पत्ती कम डालता है। वहीं, मुखिया का परिवार सपना देखता है कि हाईवे कहां से निकलेगा, और सुबह उनका पारिवारिक बिजनेस रातोंरात ग्यारह गुना बढ़ जाता है। मुखिया जी ने चुनाव में ‘चौमुखी विकास’ का वादा किया था, अब जनता का न सही, कुनबे का चौमुखी विकास तो उन्होंने पहले ही साल में पूरा कर दिया!
दीमक जब मकान मालिक बन जाए
एक दौर था जब भ्रष्टाचार को दीमक कहा जाता था, जो छिपकर व्यवस्था की लकड़ियों को खोखला करती थी। लेकिन विकास के इस नए युग में दीमक ने बड़ी मेहनत की है। उसने मैनेजमेंट का कोर्स किया, रसूखदारों की संगत की और अब वह खुद पूरे मकान की मालिक बन चुकी है।
अब जब मालिक ही पूरा मकान धीरे-धीरे स्वाद ले-लेकर खा रहा हो, तो उसे चोरी या भ्रष्टाचार कहना मकान मालिक का अपमान है। किसी महानायक ने भी तो फिल्म में कहा था कि अपनी ही जेब में हाथ डालकर बटुआ निकाल लेना भ्रष्टाचार थोड़े ही न होता है!
तकदीर का कसूर
अगर आपको ऐसे हसीन सपने नहीं आते कि कहां एथेनॉल की फैक्ट्री लगानी है या कहां हाईवे की जमीन पहले से खरीदनी है, तो व्यवस्था को कोसना बंद कीजिए। यह सरासर आपकी गरीबी और आपकी खराब तकदीर का दोष है। अपनी ‘ड्रीम क्वालिटी’ सुधारिए, साहब!
आख़िरी चश्मा:
कानून की किताबें ढूंढती रह जाती हैं कि ‘गोपनीय जानकारी का लीक होना’ किसे कहते हैं? पर साहब, जहां आस्था हो, वहां सबूत की क्या जरूरत? जब पूरा तंत्र ही ‘सपनों के सौदागरों’ से चल रहा हो, तो आम आदमी को बस अपना चश्मा साफ करना चाहिए, जय-जयकार करनी चाहिए और देखना चाहिए कि अगली बार किसके सपने में कौन सा नया हाईवे आने वाला है
