आम आदमी का चश्मा: भरा-पूरा परिवार तो 1500, अकेली जान को सिर्फ 600… ये कैसा गणित है हुज़ूर?


​नमस्कार! अपना चश्मा साफ़ कीजिए और मध्य प्रदेश की सरकारी योजनाओं पर ज़रा नज़र डालिए। आज हम सरकार के उस कैलकुलेटर की बात करेंगे, जो शायद किसी ऐसे दफ्तर में बैठकर चलाया गया है जहाँ दिल नाम की कोई चीज़ ही नहीं है।


​हमारे प्रदेश में आजकल दो तरह की बहनों की बड़ी चर्चा है। एक तरफ हैं ‘लाड़ली बहनें’ और दूसरी तरफ हैं हमारी वो ‘विधवा बहनें’ (जिन्हें सरकारी कागज़ों में ‘कल्याणी’ कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है)।


​अब ज़रा आम आदमी के चश्मे से सरकार का तराजू देखिए:


​लाड़ली बहना: घर में पति हैं, बच्चे हैं, पूरा भरा-पूरा परिवार है। सरकार खुश होकर उनके खाते में हर महीने 1500 रुपये दे रही है। बहुत अच्छी बात है, बहनों की मदद होनी ही चाहिए।


​विधवा महिला: सिर से साया उठ चुका है, दुनिया में बिल्कुल अकेली हैं। न आगे कोई, न पीछे। लेकिन जब इनके लिए सरकार का दिल पिघलता है, तो वह सीधे 600 रुपये पर आकर अटक जाता है।


​ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए! जिसके पास पूरा परिवार है, उसे 1500 रुपये। और जो दुनिया में बिल्कुल अकेली है, जिसे इस वक्त सबसे ज़्यादा सहारे की ज़रूरत है, उसे सिर्फ 600 रुपये? यह कैसा न्याय है?


​क्या महंगाई सिर्फ लाड़ली बहनों के लिए है?


​क्या सरकारी दफ्तर के बाबू यह भूल गए कि बाज़ार में आटा, दाल, तेल और दवाइयाँ सबके लिए एक ही भाव मिलती हैं? दुकानदार यह देखकर सामान सस्ता नहीं करता कि खरीदने वाली महिला विधवा है।
​सच तो यह है कि अकेली महिला का खर्चा और मानसिक तनाव एक भरे-पूरे परिवार से कहीं ज़्यादा होता है। उन्हें बीमारी में दवा भी खुद लानी है, मकान का किराया भी खुद देना है और हर सुख-दुख अकेले ही झेलना है। फिर उनके हक की राशि इतनी कम क्यों?


​नियम-कानून का बहाना


​अगर आप किसी बड़े अधिकारी से पूछेंगे कि “साहब, यह कैसी विसंगति है?” तो वो तुरंत नियमों की मोटी किताब खोलकर कह देंगे—”यह तो ऊपर से तय हुआ है, बजट ऐसा ही है।”
​कानूनन सरकार को अपनी योजनाएं बनाने का पूरा अधिकार है, और हम उस पर कोई सवाल नहीं उठा रहे। लेकिन कानून के साथ-साथ थोड़ी इंसानियत भी तो होनी चाहिए। सरकार का काम ही यही है कि जो सबसे कमज़ोर है, उसका हाथ सबसे पहले और सबसे मज़बूती से थामे।


​चश्मे की आखिरी बात


​’आम आदमी का चश्मा’ तो सीधे शब्दों में यही कहता है कि सरकार को अपनी इस दूरबीन को थोड़ा ठीक करने की ज़रूरत है। लाड़लियों को प्यार दीजिए, कोई मना नहीं करता। लेकिन जो बहनें वक्त की मार झेलकर अकेली रह गई हैं, उनके सम्मान को सिर्फ 600 रुपये में मत समेटिए।


​पेंशन की इस कमी को दूर करना कोई चुनावी अहसान नहीं, बल्कि सरकार का फर्ज है। उम्मीद है, अगली बार जब सरकारी खज़ाना खुलेगा, तो वोटों की संख्या देखकर नहीं, बल्कि इंसान की ज़रूरत देखकर पैसा तय होगा।

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