
– योगेश पंवार
रत्लाम की आबोहवा में आजकल एक अजीब सी खामोशी है, और यह खामोशी उन आम आदमियों की है जिन्होंने अपनी जिंदगी भर की पाई-पाई जोड़कर एक अदद प्लॉट खरीदा था। लेकिन सरकारी जादूगरी देखिए कि कल तक जो “सपनों का आशियाना” था, आज वह अचानक “अवैध” घोषित हो चुका है।
आइए, इस पूरे खेल को ज़रा ‘आम आदमी के चश्मे’ से देखते हैं और समझते हैं कि कैसे नौकरशाही और राजनीति के कॉकटेल ने मिलकर एक मासूम नागरिक का कबाड़ा किया है।
खेल-1: सरकार के संस्कारी ‘बेटे’ और उनकी लीला
कहानी में सरकार एक ‘मां’ की तरह है, जिसके दो-तीन ‘होनहार बेटे’ (विभाग) हैं। इन बेटों में गजब का तालमेल है—एक-दूसरे की जेब भरने का तालमेल!
बड़ा बेटा (टाउन एंड कंट्री प्लानिंग / रेरा / स्थानीय प्रशासन): जब कॉलोनाइजर बिना अनुमति के खेत में सड़कें डाल रहा था, तब यह बेटा मोतियाबिंद का शिकार था। उसने आंखें मूंद लीं। ना कोई नोटिस, ना कोई बुलडोजर।
मंझला बेटा (पंजीयन विभाग यानी रजिस्ट्री ऑफिस): जैसे ही आम आदमी प्लॉट खरीदने पहुंचा, इस बेटे की आंखें चमक उठीं। इसने ‘सरकारी मुहर’ लगाई, स्टांप ड्यूटी के नाम पर मोटी रकम ऐंठी और आम आदमी की पीठ थपथपा कर कहा—”बधाई हो, अब आप मालिक हैं।” आम आदमी ने सोचा, जब सरकार खुद पैसे लेकर रजिस्ट्री कर रही है, तो सब लीगल ही होगा।
छोटा बेटा (नगर निगम): अब जब मकान बनाने की बारी आई, तो यह छोटा बेटा हाथ में ‘अवैध’ का बोर्ड लेकर खड़ा हो गया। कहता है—”नामांतरण (Mutations) नहीं होगा, क्योंकि कॉलोनी अवैध है!”
व्यंग्य का तीखा प्रहार: वाह रे सरकार! रजिस्ट्री करते वक्त तुम्हारा स्टांप का पेट भरने के लिए वह जमीन ‘वैध’ थी, और जब आम आदमी को उसका हक (नामांतरण) देने की बारी आई, तो वही जमीन ‘अवैध’ हो गई? यह तो वही बात हुई कि शादी का रजिस्ट्रेशन भी सरकारी दफ्तर करे, शगुन के पैसे भी खुद खाए, और विदाई के वक्त कह दे कि ‘शादी अवैध है!’
खेल-2: नेताजी के ‘घोषणावीर’ हार-फूल और डस्टबिन की हकीकत
इस कहानी में तड़का लगाने आते हैं हमारे रतलाम के ‘माननीय वरिष्ठ नेताजी’। चुनाव या रैलियों के मौसम में नेताजी ने छाती ठोककर घोषणा की थी—”रतलाम की सभी अवैध कॉलोनियों को वैध कर दिया जाएगा!”
मासूम आम आदमी ने खुशी के मारे नेताजी को फूलों के हार पहनाए, ढोल-नगाड़े बजाए। नेताजी ने खूब वाहवाही लूटी और अपनी राजनीति चमका ली। लेकिन आज? नेताजी की वह लोक-लुभावन घोषणाएं सरकारी दफ्तरों के ‘डस्टबिन’ (कूड़ेदान) की शोभा बढ़ा रही हैं। नौकरशाही ने नेताजी के वादों को रद्दी का भाव दे दिया और ठगा कौन गया? वही हार पहनाने वाला आम आदमी।
टेक्निकल पॉइंट: कानूनन दोषी कौन? (Tactical Point)
नौकरशाही हमेशा आम आदमी को “अज्ञान और नासमझ” कहकर पल्ला झाड़ लेती है। लेकिन कानून की कसौटी पर देखें तो:
मप्र नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956: इसके तहत अवैध कॉलोनाइजेशन को रोकना और उस पर एफआईआर (FIR) करना नगर निगम और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है। अगर कॉलोनी कटी, तो उस समय के जिम्मेदार अफसरों पर ‘कर्तव्य में लापरवाही’ (Dereliction of Duty) की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्रेता की सावधानी (Caveat Emptor) का बहाना कब तक? कोर्ट भी मानता है कि खरीदार को जांच करनी चाहिए। लेकिन जब सरकार का एक अंग (रजिस्ट्री विभाग) खुद उस संपत्ति को रजिस्टर्ड कर रहा है, तो एक आम नागरिक सरकार पर भरोसा क्यों ना करे? क्या आम आदमी अब सीआईडी (CID) लेकर घूमे?
’चश्मे’ का आखिरी प्रहार: अब आम आदमी क्या करे?
नेताओं की रैलियों में ताली बजाना बंद कीजिए, क्योंकि उनके वादे केवल ‘चुनावी लॉलीपॉप’ हैं जो दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते पिघल जाते हैं।
अगर सरकार के एक विभाग ने रजिस्ट्री के पैसे लिए हैं, तो सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकती। यह ‘ठगी’ किसी प्राइवेट नटवरलाल ने नहीं, बल्कि ‘सरकारी सिस्टम’ ने की है। रतलाम के पीड़ित आम आदमियों को अब एकजुट होकर ‘कंज्यूमर फोरम’ (Consumer Forum) या हाईकोर्ट की शरण लेनी चाहिए, क्योंकि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और राजनेता सिर्फ अपना चेहरा चमकाने में व्यस्त हों, तो अपने हक के लिए अंधा कानून ही आखिरी रास्ता बचता है।
निष्कर्ष: नेताजी को मिला ‘हार’, अफसरों को मिला ‘स्टांप का माल’, और आम आदमी को मिला सिर्फ ‘अवैध’ का टैग और मानसिक मलाल! यही है रतलाम की विकास गाथा का असली हाल।
