
हमारे देश में क्रांति लाने के तरीके समय के साथ कितने आधुनिक और किफ़ायती हो गए हैं, यह देखकर दिल गद्गद हो जाता है। एक ज़माना था जब लोगों को समाज सुधारने या व्यवस्था से लड़ने के लिए सालों-साल किताबें पढ़नी पड़ती थीं, लाठियां खानी पड़ती थीं और जेलों में चक्की पीसनी पड़ती थी। पर अब? अब क्रांति का बजट घटकर महज़ एक 200 रुपये की सफ़ेद टी-शर्ट और एक लाल-काले स्केच पेन तक सीमित हो गया है।

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक नई ‘महा-क्रांति’ का जन्म हुआ। कुछ युवा एक सफ़ेद टी-शर्ट पहनकर प्रकट हुए, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— “ना मर्दों के प्रदेश मध्य प्रदेश से भी आये हैं मर्द।”
टी-शर्ट पर लिखा यह नारा पढ़कर हमारी आँखों का ‘आम आदमी वाला चश्मा’ थोड़ा धुंधला हो गया। हमें लगा शायद हम गलत पढ़ रहे हैं, लेकिन फिर गौर से देखा तो समझ आया कि यह तो समाज सुधार का सबसे आधुनिक और ‘कूल’ तरीका है!
अब ज़रा सोचिए—जिस प्रदेश की मिट्टी में अन्न उगाकर यहाँ के किसान पूरे देश का पेट भरते हैं, जहाँ के मजदूर दिन-रात पसीना बहाकर इमारतें खड़ी करते हैं, जहाँ के युवा सीमाओं पर बंदूकें ताने खड़े हैं, और जो आम नागरिक रोज़ सुबह उठकर कचौरी-पोहा खाकर ईमानदारी से अपने काम पर निकल जाता है… उन सबको एक ही झटके में ‘नामर्द’ घोषित कर दिया गया! और यह घोषणा किसने की? उन्हीं युवाओं ने जो इसी प्रदेश का पानी पीकर, इसी के स्कूलों में पढ़कर और यहीं का अन्न खाकर बड़े हुए हैं।
इसे कहते हैं असली “डिजिटल मर्दानगी”!
मर्दानगी की नई परिभाषा भी कितनी दिलचस्प हो गई है। पहले माना जाता था कि संकट में किसी की मदद करना, अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना, परिवार और समाज का सहारा बनना और सबको साथ लेकर चलना मर्दानगी है। लेकिन 21वीं सदी के ‘टी-शर्ट क्रांतिकारियों’ ने इस परिभाषा को पूरी तरह अपडेट कर दिया है। अब अपनी टी-शर्ट पर पूरे प्रदेश की खिल्ली उड़ाने वाला नारा छपवाकर कैमरे के सामने छाती चौड़ी करके खड़े हो जाना ही ‘परम मर्दानगी’ का प्रमाण पत्र है!
लेकिन रुकिए, इस पूरी कहानी का सबसे मजेदार पहलू तो अभी बाकी है।आज जो युवा कैमरे के सामने खड़े होकर पूरे प्रदेश को ‘नामर्दों का प्रदेश’ बताकर वाहवाही और लाइक्स बटोर रहे हैं, कल जब उन्हें कोई सरकारी नौकरी चाहिए होगी, कॉलेज में एडमिशन लेना होगा, या किसी सरकारी योजना का भत्ता चाहिए होगा, तो वे सबसे पहले इसी प्रदेश का ‘मूल निवासी प्रमाण पत्र’ (Domicile Certificate) बनवाकर लाइन में खड़े मिलेंगे। तब यह प्रदेश अचानक से उनका ‘अपना’ हो जाएगा, और जैसे ही इंस्टाग्राम का कैमरा ऑन होगा, वही प्रदेश फिर से उपहास का केंद्र बन जाएगा!
खैर, लोकतंत्र में सवाल पूछना, सरकार की नाकामियों पर गुस्सा होना और अपराधों के खिलाफ आवाज उठाना हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन समस्या यह है कि आजकल के ‘रील-वीर’ समस्या के खिलाफ लड़ने की जगह पूरे समाज को नीचा दिखाने में ज़्यादा आनंद लेते हैं। डॉक्टर अगर बीमारी का इलाज करने की जगह पूरे शरीर को ही बेकार घोषित कर दे, तो उसे इलाज नहीं, बेवकूफी कहते हैं।
सच तो यह है कि इन टी-शर्ट वाले वीरों ने समाज को कोई आईना नहीं दिखाया, बल्कि कैमरे के सामने खड़े होकर खुद का ही चेहरा देख लिया है।
मध्यप्रदेश या दुनिया के किसी भी प्रदेश को ऐसे किसी ‘टी-शर्ट ब्रांडेड मर्दानगी सर्टिफिकेट’ की ज़रूरत नहीं है। यह प्रदेश यहाँ के मेहनतकश लोगों, उनकी संस्कृति और उनके संघर्षों से चलता है। अगर सचमुच बदलाव लाना है तो विचारों का वज़न बढ़ाइए, क्योंकि टी-शर्ट के कपड़े का जीएसएम (GSM) बढ़ा लेने से किसी का विचार बड़ा नहीं हो जाता!
