
योगेश पंवार (‘आम आदमी का चश्मा’)
रतलाम की सड़कों पर निकलो तो ऐसा लगता है मानो शहर की नींव गिट्टी-सीमेंट पर नहीं, बल्कि नेताओं के फ्लेक्स और बांस-बल्ली के स्ट्रक्चर पर टिकी है! चौराहे पर ट्रैफिक लाइट दिखे न दिखे, लेकिन ‘परम आदरणीय’ नेताजी का विशालकाय मुस्कुराता हुआ चेहरा जरूर दिख जाएगा। भले ही आपको यह समझ न आए कि दोबत्ती चौराहे से चांदनी चौक किधर जाना है, पर यह जरूर पता चल जाएगा कि किस भइयाजी के समर्थक का जन्मदिन किस तारीख को है!

अब खबर आई है कि इंदौर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए सख्त आदेश दिया है कि 24 घंटे के भीतर सभी अवैध राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक होर्डिंग-बैनर हटाए जाएं। शिकायत मिलते ही नगर निगम को एफआईआर (FIR) दर्ज कराने और कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
कोर्ट ने ‘आउटडोर मीडिया रूल्स-2017’ का पन्ना पलटकर नियम भी याद दिला दिए हैं:
खंभों, पेड़ों और डिवाइडरों पर बिना अनुमति फ्लेक्स टांगना अवैध है।
बिना स्ट्रक्चरल इंजीनियर के सुरक्षा प्रमाण पत्र के बड़े-बड़े बोर्ड लगाना अवैध है।
दिशा-सूचक बोर्ड (Signboards) और ट्रैफिक सिग्नल छिपाने वाले पोस्टर अवैध हैं।
फुटपाथ और सर्विस रोड पर पैदल चलने वालों का रास्ता रोकने वाले यूनिपोल अवैध हैं।
हवा के दबाव और वजन के मानकों का उल्लंघन करने वाले भारी-भरकम फ्रेम अवैध हैं।
लेकिन साहेब, यह तो नियम-कायदों की बात हुई… रतलाम की कड़वी हकीकत तो कुछ और ही है!
रतलाम में तो आलम यह है कि स्ट्रक्चरल इंजीनियर की रिपोर्ट छोड़िए, यहां नेताओं का पूरा राजनीतिक करियर और विशालकाय होर्डिंग सुतली के दो धागों और घटिया बांस के सहारे झूल रहा होता है!
जैसे ही रतलाम में थोड़ी तेज हवा चलती है, ये भारी-भरकम फ्लेक्स और लोहे के एंगल हवा में ‘सुपरमैन’ बनकर उड़ने लगते हैं। सड़क पर चलता हुआ आम आदमी यह सोचकर परेशान रहता है कि सामने से कोई वाहन टकराएगा या ऊपर से किसी नेताजी का बधाई संदेश सीधे उसकी गर्दन पर आ गिरेगा! कई बार तो लोग एक्सीडेंट होते-होते बचे हैं, और कई बेकसूर राहगीर इन उड़ते होर्डिंग की चपेट में आकर घायल भी हो चुके हैं। नेताओं की ‘सहानुभूति’ तो बाद में मिलती है, पर उनके होर्डिंग का ‘सीधा प्रहार’ जनता को सड़क पर ही मिल जाता है।
दिशा-सूचक बोर्ड का तो रतलाम में अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। ट्रैफिक लाइट लाल है या हरी, यह जानने के लिए आपको नेताजी के पोस्टर के किसी फटे हुए कोने से झांककर देखना पड़ता है!
कोर्ट ने तो कह दिया कि “24 घंटे में हटाओ”, और निगम साहब कहते हैं कि “टीम बनाकर कार्रवाई करेंगे।” अब सवाल यह है कि क्या नगर निगम के अमले को हर चौराहे पर लगे इन ‘अवैध जंगलों’ को देखने के लिए ‘आम आदमी का चश्मा’ उधार मांगना पड़ेगा? या फिर हर बार की तरह कागजों पर कार्रवाई का फ्लेक्स टांगकर 24 घंटे का यह आदेश भी किसी नए होर्डिंग के पीछे छुपा दिया जाएगा?
नेताजी! जनता को बधाइयों और शुभकामनाओं के भारी-भरकम होर्डिंग से ज्यादा, सुरक्षित और साफ-सुथरी सड़कों की जरूरत है। अगर चेहरे ही चमकाने का इतना शौक है, तो काम ऐसा कीजिए कि जनता के दिल में जगह बने… सड़क के खंभों पर जानलेवा बोझ बनकर लटकने की जरूरत ही न पड़े!
