
:- योगेश पंवार
सत्तर के दशक की बात ही कुछ अलग थी। उस दौर में शिक्षा का स्तर जरा ढीला-ढाला था, साक्षरता दर कम थी और जीवन में तंगी तथा गरीबी का बोलबाला था। आम इंसान के पास रोजगार के गिने-चुने साधन हुआ करते थे। उस जमाने में जब किसी सरकारी कागज, मजदूरी के रजिस्टर या दस्तावेज पर दस्तखत की जरूरत पड़ती, तो जो लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, उनसे सीधे स्याही के पैड पर अंगूठा लगवा लिया जाता था।
उस समय समाज का तथाकथित पढ़ा-लिखा वर्ग इन बेचारों की चुटकी लेते हुए, मुस्कुराकर ‘अंगूठाछाप’ कहकर पुकारता था।
इस अपमानजनक तमगे से बचने के लिए लोगों ने बड़ी मेहनत की। ढलती उम्र में भी रातों को दीये की रोशनी में आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचकर अपना नाम लिखना सीखा, ताकि दुनिया के सामने कोई उन्हें ‘अंगूठाछाप’ कहकर नीचा न दिखा सके। इंसान ने सोचा कि अब उसने हमेशा-हमेशा के लिए उस नीले पैड और अंगूठे के कलंक से मुक्ति पा ली है।
फिर आया ‘डिजिटल क्रांति’ का नया जमाना!
समय का पहिया घूमा, दौर बदला और इलेक्ट्रॉनिक तरक्की का ऐसा सैलाब आया कि विज्ञान ने दिन-दुगनी और रात-चौगुनी प्रगति कर ली। बड़े-बड़े कम्प्यूटर, बायोमीट्रिक मशीनें और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दौर आ गया।
लेकिन मजे की बात देखिए—इतनी पढ़ाई-लिखाई, डिग्रियां और बड़ी-बड़ी टेक कंपनियाँ बनाने के बाद आज हम फिर घूम-फिरकर उसी मोड़ पर आकर खड़े हो गए हैं!
आज का दृश्य यह है:
M.Tech, B.Tech, Ph.D और MBA की डिग्री हाथ में लिए बाबू साहब दफ्तर पहुँचते हैं।
सूट-बूट पहनकर सीधे ‘बायोमीट्रिक मशीन’ के सामने खड़े होते हैं।
और अपनी उपस्थिति (Attendance) दर्ज कराने के लिए… वही अंगूठा पंच करते हैं!
चश्मे का नजरिया:
“अजीब विडंबना है! जिस अंगूठे को छिपाने के लिए पीढ़ियों ने कलम उठाई थी, आज उसी अंगूठे को कांच की स्क्रीन पर रगड़ने के लिए पूरा जमाना लाइन में खड़ा है।”
फर्क सिर्फ ‘स्याही’ और ‘सेंसर’ का है
कल का अंगूठा नीली स्याही में डूबकर कागज़ पर छपता था, तो समाज उसे ‘अज्ञानता’ की निशानी मानता था।
आज का अंगूठा लाल रोशनी वाली लेजर लाइट पर टिकता है, तो समाज उसे ‘हाई-टेक डिजिटल इंडिया’ और ‘सुरक्षा’ का प्रतीक बताता है।
पहले कहा जाता था— “पढ़-लिख लो, नहीं तो जिंदगी भर अंगूठा ही लगाते रहोगे!”
आज मैनेजर साहब कहते हैं— “साहब! जब तक अंगूठा नहीं लगाओगे, तब तक आज की सैलरी पक्की नहीं होगी!”
पुराने ज़माने का अनपढ़ इंसान स्याही पोंछने के लिए कपड़े ढूँढता था, आज का उच्च-शिक्षित प्रोफेशनल मशीन का कांच साफ करने के लिए रुमाल निकालता है। शब्द वही है, अंगूठा वही है… बस अब वह इलेक्ट्रॉनिक और कॉर्पोरेट हो चुका है!
निष्कर्षात्मक चुटकी
समय का चक्र वाकई बड़ा अद्भुत है। जिस ‘अंगूठाछाप’ शब्द को इतिहास के पन्नों में दफन हो जाना चाहिए था, उसे हमारी आधुनिक तकनीक ने नया जीवन दे दिया है।
अब तो डर इस बात का है कि कहीं आने वाले समय में बायोमीट्रिक मशीनें भी इंसानों से न कह दें— “डिग्री जेब में रखिए जनाब, यहाँ आपकी पहचान आपकी पढ़ाई से नहीं… आपके अंगूठे की छाप से ही होगी!”
