आम आदमी का चश्मा: “सड़ा हुआ मॉल, एक्सपायरी वाला झोल और सोता हुआ प्रशासन”


​लीजिए साहब, बड़े दिनों बाद शहर में ‘इंटरनेशनल’ लेवल का विकास देखने को मिला है। हम तो अब तक यही सोचते थे कि बड़े-बड़े शीशों वाले, चमचमाते एयर-कंडीशनर वाले मॉल में सिर्फ अमीर लोग और महंगी ब्रांडेड चीजें मिलती हैं। लेकिन पिछले दिनों पता चला कि वहां ‘एक्स्ट्रा प्रोटीन’ भी मुफ्त मिल रहा है! जी हां, शहर के एक नामी-गिरामी शॉपिंग मॉल के खाद्य पदार्थों में जिंदा कीड़े कुलबुलाते पाए गए। अब इसे लापरवाही मत कहिए साहब, यह तो मॉल वालों का ‘नेचर-लव’ है कि एसी की ठंडी हवा में सिर्फ इंसानों को ही नहीं, कीड़ों-मकोड़ों को भी वीआईपी ट्रीटमेंट दे रहे हैं।​आइए, ज़रा चश्मा साफ़ करके शहर के इस नए और चमचमाते बाज़ार का सच देखते हैं:


​1. तारीख बदलने का ‘जादू’ और जहर का कारोबार


​मॉल के ठंडे गलियारों से निकलकर ज़रा शहर की किराना और कोल्डड्रिंक की दुकानों की तरफ रुख कीजिए। यहाँ के दुकानदार इतने ‘हुनहार’ और ‘क्रिएटिव’ हैं कि एक्सपायरी डेट को मिटाने में उन्होंने महारत हासिल कर ली है। कंपनी ने बोतल पर लिखा ‘एक्सपायरी: मई 2026’, तो हमारे दुकानदार भाई अपनी जादुई उंगलियों से उसे ‘दिसंबर 2026’ बना देते हैं।


सस्ता, सड़ चुका माल, नई तारीख का ठप्पा लगाकर महंगे दामों में सीधे आम आदमी के पेट में उतारा जा रहा है। जहर को अमृत बताकर बेचने का ऐसा हुनर सिर्फ यहीं देखने को मिल सकता है।


​2. तेल के नाम पर ‘पाम ऑयल’ का खेल


​बाज़ार में मिलने वाले पैकेटबंद खाने को देखकर लगता है कि हम सेहत खरीद रहे हैं, लेकिन असल में हम बीमारी की ईएमआई (EMI) चुका रहे हैं। शुद्ध तेल के नाम पर धड़ल्ले से पाम ऑयल का कचरा परोसा जा रहा है। खाने की आधी से ज्यादा चीजें ‘अमानक’ (Substandard) हैं, जिनमें कैंसर बांटने वाले नकली रंग और जहरीले केमिकल खुलेआम मिलाए जा रहे हैं। ऐसा खाना जिसे देखकर जानवर भी मुंह फेर लें, उसे सुंदर चमकीली थैलियों में पैक करके आम आदमी के बच्चों को “हेल्दी स्नैक” कहकर खिलाया जा रहा है।


​3. “कुंभकर्णी नींद” में सोया जिम्मेदार तंत्र


​अब सवाल यह उठता है कि क्या इस पूरे खेल की खबर हमारे शहर के रखवालों, यानी खाद्य सुरक्षा विभाग और प्रशासन को नहीं है? अरे साहब, उन्हें सब पता है! लेकिन दिक्कत यह है कि जब तक कोई बड़ी घटना न हो जाए या जनता हंगामा न खड़ा कर दे, तब तक हमारे साहब लोगों के ‘स्वाद’ का बजट डिस्टर्ब नहीं होता।


​लाखों की सैलरी पाने वाले जिम्मेदार अधिकारी शायद यह सोचकर दफ्तरों में आराम फरमा रहे हैं कि:
​”आम आदमी का पेट तो लोहे का होता है, वह कीड़े भी पचा जाएगा, नकली रंग भी सोख लेगा और एक्सपायरी कोल्डड्रिंक पीकर अमर हो जाएगा।”​महीने में एक-दो बार जब साहब लोग ‘डिनर’ करने या ‘निरीक्षण’ के नाम पर निकलते हैं, तो बड़े मॉल और दुकानों से क्या कलेक्ट होता है—सैंपल या कुछ और? यह शहर का बच्चा-बच्चा जानता है।


​चश्मे की आखिरी बात:


मॉल बड़ा होने से नीयत बड़ी नहीं होती साहब। जब तक चंद रुपयों के मुनाफे के लिए आम आदमी की सेहत और उसके बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ होता रहेगा, और जब तक प्रशासन आंखें मूंदकर वीआईपी मेहमाननवाजी का आनंद लेता रहेगा, तब तक यह चमचमाता शहर अंदर से ऐसे ही सड़ता रहेगा।


​जिम्मेदारों, ज़रा दफ्तरों के एयर कंडीशनर से बाहर निकलिए और इन मिलावटखोरों पर वो ‘तीखा’ एक्शन लीजिए, जिसकी एक्सपायरी डेट कभी खत्म न हो!

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