
इन दिनों हमारे शहर की नगर निगम के गलियारों में एक नया और अनोखा ‘सर्कस’ देखने को मिल रहा है। अमूमन इतिहास गवाह है कि विपक्ष का काम होता है सरकार की कमियां निकालना और आरटीआई (सूचना का अधिकार) के तीर चलाना। लेकिन भाई साहब, हमारे शहर की रीती-नीति ही अलग है। यहाँ तो सत्ता की मलाईदार कुर्सी पर बैठे माननीय पार्षद महोदय ही खुद अपनी ‘नगर सरकार’ के विभागों में आरटीआई का चश्मा लगाकर घूम रहे हैं।
आम आदमी हैरान है कि यह ‘घर के भेदी’ अचानक लंका ढाने पर क्यों आमादा हैं?
चाय की टपरी पर बैठे एक बुजुर्ग ने ‘आम आदमी का चश्मा’ साफ करते हुए इसके तीन गहरे अर्थ समझाए। पहला अर्थ तो यह कि हमारे ये माननीय पार्षद इतने परम-ईमानदार हैं कि उन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार में ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ वाला दृश्य दिखाई दे रहा है। वो जनता को यह बताना चाहते हैं कि—”बाकी सब तो चोर हैं, बस एक हम ही हैं जो गंगा नहाकर आए हैं।”
दूसरा अर्थ थोड़ा फिल्मी है। राजनीति के पंडित कहते हैं कि जब अपनी ही सरकार में ‘दुकान’ फीकी चलने लगे, या मीडिया की सुर्खियों का सूखा पड़ने लगे, तो आरटीआई से बड़ा कोई संजीवनी बूस्ट नहीं होता। खुद ही सरकार चलाओ, खुद ही उसकी आरटीआई निकालो और खुद ही सुबह की चाय के साथ अखबार में अपनी फोटो देखकर मुस्कुराओ। इसे कहते हैं—’चित भी मेरी, पट भी मेरी।’
लेकिन गलियारों में उड़ती-उड़ती एक तीसरी और बेहद ‘सस्ता’ चर्चा भी तैर रही है। लोग दबी जुबान से कह रहे हैं कि बात देश-सेवा या ईमानदारी की नहीं है, असली खेल तो ‘पत्ती और हिस्सेदारी’ का है। जब तक विभागों के ठेके-पट्टों में ‘सहमति’ की बांसुरी बजती रहती है, तब तक सब ऑल इज वेल रहता है। लेकिन जैसे ही सुर बिगड़े, सुरमई शाम आरटीआई के मुकदमों में बदल जाती है।
तभी तो अचानक हमारे खोजी पार्षदों को शहर के ‘प्राइवेट अस्पतालों’ के पीछे की जमीनों की याद आने लगी है। आरटीआई के तीरों से पूछा जा रहा है कि हुजूर, ये जमीनें किस ‘मद’ में अलॉट हुई थीं? कागजों में जहाँ ‘जनसेवा और अस्पताल’ का बोर्ड लगा था, वहाँ बैकग्राउंड में कौन सा झोल-झाल चल रहा है?
इतना ही नहीं, कागजों पर जो ‘पौधारोपण अभियान’ के तहत हरियाली की चादर बिछाई गई थी, हमारे माननीय अब उसकी फाइलें खंगाल रहे हैं। जनता सोच रही है कि इतने सालों से जो पेड़ सिर्फ कागजों पर ऑक्सीजन दे रहे थे, उनकी याद आज अचानक क्यों आई? क्या वाकई पर्यावरण की चिंता है, या फिर उस ‘हरियाली’ में अपना हिस्सा न मिल पाने का गम है?
इसे कमजोर नेतृत्व कहें, गुटबाजी का चरम कहें या फिर खुद की ब्रांडिंग का नया फॉर्मूला—पर सच यह है कि अपनी ही बारात में दूल्हे के भाई ही जब बैंड बजाने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि अंदर का खाना ठीक से परोसा नहीं गया है।
अब देखना यह है कि इस झोल-झाल और जमीनों-पौधों की खोजी फाइलों से जनता को कोई अधिकार मिलता है या सिर्फ कुछ नेताओं को अखबारों की सुर्खियां! खैर, आम आदमी तो चश्मा लगाकर तमाशा देख रहा है और सोच रहा है कि—”अजब तेरी नगर निगम, गजब तेरे पहरेदार!”
