
रील के चक्कर में दांव पर लग जाए किसी की ‘रियल’ जिंदगी!
साहब! अस्पताल मनोरंजन का साधन नहीं, जिंदगी और मौत के बीच का वो पुल है जहाँ एक सेकंड की लापरवाही भी किसी हंसते-खेलते परिवार को ताउम्र का मातम दे सकती है।
लेकिन आजकल अगर आप किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड, ओपीडी या ड्यूटी काउंटरों पर चले जाएं, तो आपको एक अजीब सा ‘इमरजेंसी नजारा’ देखने को मिलेगा। सामने मरीज दर्द से तड़प रहा होता है, तीमारदार डॉक्टरों और कंपाउंडरों के आगे हाथ जोड़ रहे होते हैं, और दूसरी तरफ अस्पताल का जिम्मेदार स्टाफ कोने में छिपकर, या फिर ड्यूटी टेबल के नीचे हाथ छुपाकर मोबाइल पर रील्स सरका रहा होता है। कुछ तो इतने ‘व्यस्त’ होते हैं कि एक हाथ से मरीज को ड्रिप चढ़ाई जा रही होती है और दूसरे हाथ से कान पर फोन चिपका होता है।
”आम आदमी का चश्मा” आज सीधे सरकार, प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन से यह कड़ा सवाल पूछता है:
क्या इन अति-संवेदनशील जगहों पर तैनात कर्मचारियों का पहला फर्ज मरीज की जान बचाना है, या मोबाइल पर अपना मनोरंजन करना?
अस्पताल जैसी जगह, जहाँ हर मिनट में किसी की सांसों की डोर बंधी होती है, वहाँ ध्यान का जरा सा भी भटकना जानलेवा साबित हो सकता है। गलत दवाई दे दी जाना, ड्रिप खत्म होने पर भी ध्यान न रहना, या मरीज की गंभीर स्थिति को समय पर नोटिस न कर पाना—ये सब उस ‘डिजिटल ध्यान भटकाव’ का नतीजा हैं, जो ड्यूटी के समय मोबाइल रखने की खुली छूट के कारण पैदा हुआ है।
जनता की पुरजोर मांग: अस्पताल हो ‘नो-मोबाइल ड्यूटी जोन’
आज ‘आम आदमी’ के चश्मे से देश के स्वास्थ्य महकमे और नीति निर्माताओं से यह पुरजोर मांग की जा रही है:
ड्यूटी के दौरान मोबाइल पर पूर्ण प्रतिबंध: जितने भी कर्मचारी (पैरामेडिकल स्टाफ, नर्स, वार्ड बॉय और काउंटर स्टाफ) इमरजेंसी और संवेदनशील वार्डों में ड्यूटी पर तैनात हैं, उनके ड्यूटी आवर्स के दौरान पर्सनल मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए।
लॉकर सिस्टम अनिवार्य हो: अस्पताल में एंट्री करते ही स्टाफ को अपना पर्सनल फोन लॉकर में जमा करना पड़े।
इमरजेंसी के लिए हो अल्टरनेटिव व्यवस्था: अगर कर्मचारी के घर से कोई बेहद जरूरी फोन आना हो, तो उसके लिए हर वार्ड या विभाग में एक डेडिकेटेड ‘ऑफिशियल लैंडलाइन नंबर’ या ‘इमरजेंसी हेल्प डेस्क नंबर’ होना चाहिए, जिस पर सूचना दी जा सके। ताकि परिवार से संपर्क भी न टूटे और मरीज की सुरक्षा से खिलवाड़ भी न हो।
सख्त कार्रवाई का प्रावधान: अगर कोई कर्मचारी ड्यूटी के दौरान पर्सनल फोन पर चैटिंग, गेमिंग या सोशल मीडिया चलाता पकड़ा जाए, तो उसे सीधे सस्पेंड करने या भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान हो।
आखिरी बात:
सुरक्षा और जिम्मेदारी से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। जब हम हवाई जहाज में बैठते हैं, तो सुरक्षा के लिए फोन फ्लाइट मोड पर डाल देते हैं। तो फिर अस्पताल, जो जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा केंद्र है, वहाँ का स्टाफ अपनी ड्यूटी को ‘फ्लाइट मोड’ पर क्यों रखता है? जनता के टैक्स के पैसे से तनख्वाह पाने वाले इन कर्मचारियों को यह समझना होगा कि फोन पर आने वाला नोटिफिकेशन बाद में भी देखा जा सकता है, लेकिन किसी की थम चुकी सांसें दोबारा लौटकर नहीं आ सकतीं।
अस्पतालों में मोबाइल के इस वायरस का इलाज अब जरूरी ही नहीं, बल्कि बेहद अनिवार्य हो चुका है!
