
नमस्कार पाठकों! उठाइए चेहरे से गंभीरता का नकाब और पहन लीजिए ‘आम आदमी का चश्मा’। आज जिस सियासी दंगल की हम बात कर रहे हैं, उसके लिए चुनावी मैदान की नहीं, बल्कि भारी मात्रा में 5G डेटा और एक अच्छे वाई-फाई की जरूरत है।
इन दिनों सोशल मीडिया पर एक नई डिजिटल ‘क्रांति’ रेंग रही है—
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)। नारा है—‘हम नहीं, सिस्टम बदलेगा’। सुनने में यह कीटनाशक का विज्ञापन लग सकता है, लेकिन दावा है कि यह देश के ‘Gen-Z’ (आज के रील-लोलुप युवाओं) का नया आंदोलन है। पर यक्ष प्रश्न यह है कि महज चार दिनों में लाखों की फौज खड़ी करने वाला यह खेल युवाओं का असली गुस्सा है, या सिर्फ ‘लाइक-शेयर’ के
एल्गोरिदम का कोई नया मायाजाल?
भारतीय राजनीति की रीत है कि एक पार्टी के विरोध में चार और कुकुरमुत्ते की तरह उग आती हैं। अभी लोग कॉकरोच का मेनिफेस्टो समझ ही रहे थे कि स्क्रीन पर अवतरित हो गईं—’छिपकली जनता पार्टी’ और ‘हिट (HIT) जनता पार्टी’!
अब सोशल मीडिया पर ऐसा ‘छद्म युद्ध’ छिड़ा है, जहां रील्स के बैकग्राउंड म्यूजिक पर विचारधाराएं तय हो रही हैं।
एक तरफ कॉकरोच अंधेरे कोनों से निकलकर न्यायपालिका और आरक्षण की बैटिंग कर रहा है; दूसरी तरफ छिपकलियां दीवार पर चिपके-चिपके इन्हें निगलने की कूटनीति रच रही हैं; और इन दोनों से कमेंट बॉक्स को बचाने के लिए ‘हिट’ स्प्रे वाले लोकतंत्र का कीटनाशक लिए घूम रहे हैं। विडंबना देखिए, जो युवा देश की असली संसद की गंभीर बहसों को ‘बोरिंग’ कहकर स्क्रॉल कर देते थे, वे अब कॉकरोच की मूंछों और छिपकली की पूंछ के सिंबल तले देश का भविष्य तय करने में रात-रात भर डेटा फूंक रहे हैं।
जब इस ड्रामे को जमीनी हकीकत की कसौटी पर रगड़ते हैं, तो एक कड़वा सच सामने आता है। आज का युवा बेरोजगारी और महंगी शिक्षा से जूझ रहा है, लेकिन इस गंभीर आक्रोश को मीम्स और वर्चुअल गैंगवार में बदलकर एक ‘सेफ वाल्व’ दे दिया गया है—यानी गुस्सा थूकना भी है तो कीबोर्ड पर थूको, ताकि सत्ता को आंच भी न आए और मनोरंजन भी हो जाए।
यह कोई राजनीतिक चेतना नहीं, बल्कि एल्गोरिदम की उंगलियों पर नाचती वो भीड़ है जिसे भ्रम है कि वे ‘क्रांति’ कर रहे हैं। हकीकत यह है कि जब तक डेटा ऑन है, यह क्रांति जिंदा है; पैक खत्म, तो क्रांति भी ‘आउट ऑफ नेटवर्क’। सोचिएगा जरूर, जब देश की असल समस्याएं दीवारों पर छिपकली की तरह रेंग रही हों और सिस्टम में कॉकरोच की तरह दीमक लगी हो, तब रील्स पर यह खेल खेलना मनोरंजन तो हो सकता है, देश का मुस्तकबिल बदलना नहीं।
